
शारदीय नवरात्र- दशमी तिथि को हवन का विशेष विधान, बिना हवन अधूरी है पूजा: पं. मोहित नारायण मिश्र
मधुबनी – 20 अक्टूबर। शारदीय नवरात्र में नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना के बाद दशमी तिथि पर हवन का विशेष महत्व है। पंडितों के अनुसार हवन के बिना नवरात्र की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती। इस संबंध में प्रसिद्ध ज्योतिषी पं. मोहित नारायण मिश्र ने बताया कि शास्त्रों में नवरात्र के दशम दिवस पर हवन, कुमारी पूजन और विसर्जन का विधान बताया गया है।
पं. मिश्र ने कहा कि नवरात्र में जो साधक नौ दिन तक व्रत, जप और पाठ करते हैं, उन्हें दशमी के दिन हवन अवश्य करना चाहिए। हवन से वातावरण की शुद्धि होती है, घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मां दुर्गा प्रसन्न होकर अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।”
हवन की आवश्यकता और महत्व—
उन्होंने विस्तार से बताया कि दुर्गा सप्तशती के पाठ और मंत्र जप के बाद हवन करने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। हवन को पूजा का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण माना गया है। हवन में आम की लकड़ी, घी, तिल, जौ, और विभिन्न औषधीय सामग्रियों की आहुति दी जाती है। इससे निकलने वाला धुआं वातावरण में मौजूद बैक्टीरिया और नकारात्मक शक्तियों को नष्ट करता है।
दशमी पर विधि-विधान से किए गए हवन से शत्रु बाधा, ग्रह दोष, रोग और दरिद्रता दूर होती है तथा परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
पं. मिश्र के अनुसार दशमी के दिन सुबह स्नान कर पवित्र वस्त्र धारण कर हवन कुंड में ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ मंत्र के साथ 108 आहुतियां देनी चाहिए। हवन के अंत में क्षमा प्रार्थना और आरती कर कन्या भोजन कराना अत्यंत शुभदायी होता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि दशमी को केवल विजयादशमी के रूप में न मनाएं, बल्कि अपने घरों में वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हवन कर सनातन परंपरा का निर्वहन करें।



