
कोजागरा 25 अक्टूबर को, मिथिला में मखान-पान से सजेंगे आंगन, गीत-संगीत की महफिल सजेगी: पं. ऋषिनाथ झा
मधुबनी- 23 अक्टूबर। मिथिला की प्राचीन और सबसे खास परंपरा कोजागरा पर्व इस साल 25 अक्टूबर को मनाया जाएगा। शरद पूर्णिमा की रात मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर मिथिला के नवविवाहित वरों के घरों में तैयारियां तेज हो गई हैं। कोजागरा की जानकारी देते हुए प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. ऋषिनाथ झा ने बताया कि कोजागरा को मिथिला में सिर्फ पर्व नहीं, बल्कि दामाद के सम्मान और लक्ष्मी पूजा का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है।
पं. झा ने बताया कि परंपरा के अनुसार इस दिन कन्या पक्ष के घर से वर के घर कोजागरा का भार आता है। इसमें लगभग पांच से छह फुट व्यास वाले बांस से बने डाला पर धान, मखान, पांच नारियल, पांच हत्था केला, दही, पान की ढोली, मखान की माला, जनेऊ, सुपारी, इलायची से सजा कलात्मक वृक्ष, पांच प्रकार की मिठाई, छाता, छड़ी, वस्त्र सहित अन्य सामग्री सजाकर भेजी जाती है।
संध्या काल में वर को ससुराल से आए नए वस्त्र पहनाकर चुमाओन की रस्म पूरी की जाती है। घर की महिलाएं आंगन में अष्टदल कमल का अरिपन बनाती हैं। चुमाओन के बाद वर चांदी की कौड़ी से पचीसी खेलते हैं। इस दौरान महिलाओं के बीच हास-परिहास और हंसी-ठिठोली का दौर चलता है। साले और बहनोई के बीच पचीसी खेलना इसका सबसे रोचक हिस्सा होता है। इसके बाद वर अपने कुल देवता और देवी को प्रणाम कर बड़ों से आशीर्वाद लेते हैं और फिर शुरू होता है मखान और पान बांटने का दौर, जो देर रात तक चलता है।
उन्होंने बताया कि कोजागरा की रात गांव-मोहल्ले में मैथिली गीत-संगीत की महफिल सजती है। कहीं मैथिल संस्कृति के गीत बजते हैं, तो कहीं स्थानीय कलाकार समदाउन और कोजागरा के गीतों से समां बांधते हैं। इसी दिन मिथिला के कई घरों में लक्ष्मी पूजा भी की जाती है और हर घर में खीर बनाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा है।



