
बिहार में शिक्षित बेरोजगार भत्ता घोटाला: 1989 में बंद योजना 1994 तक कागजों पर चलती रही, करोड़ों का गबन, PIL की तैयारी
पटना – 18 अगस्त। बिहार में शिक्षित बेरोजगार भत्ता योजना के नाम पर करोड़ों रुपये के गबन का बड़ा मामला सामने आया है। आरोप है कि 1989 में बंद हो चुकी योजना को कागजों पर 1994 तक चलाकर 2 लाख शिक्षित बेरोजगारों के नाम पर करोड़ो का फर्जी भुगतान दिखाया गया। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि साल 1989 के बाद भुगतान के नाम पर दिखाई गई करोड़ों की राशि आखिर गई कहां?
बतादें की बिहार सरकार ने 2 अक्टूबर 1981 को “नियोजन सांकेतिक भत्ता योजना” शुरू की थी। इसे “शिक्षित बेरोजगार भत्ता” के नाम से भी जाना जाता था। इस योजना के तहत बिहार के करीब 2 लाख से अधिक शिक्षित बेरोजगारों को प्रतिमाह 50 भत्ता देने का प्रावधान था। सरकार के रिकॉर्ड और अधिकारियों के अनुसार यह योजना 31.12.1989 तक ही चलनी थी।लेकिन साल 1989 के बाद भी 5 साल तक भुगतान हुआ।

शिक्षित बेरोजगार संघ बिहार के प्रदेश सचिव रामविलास महतो ने बताया कि योजना 31.12.1989 को बंद हो गई थी। मधुबनी सहित पूरे बिहार में किसी भी शिक्षित बेरोजगार को उसके बाद भत्ते का भुगतान नहीं किया गया। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में दिखाया गया कि 1994 तक योजना चालू रही और 2 लाख शिक्षित बेरोजगारों को प्रतिमाह 50 की दर से भत्ता भुगतान किया गया। इस तरह 5 साल तक यानी 1990 से 1994 तक कागजों पर करोड़ों रुपये का भुगतान दिखाकर गबन किया गया।
रामविलास महतो ने बताया कि भत्ता सीधे बैंक खाते में नहीं जाता था। प्रखंड कार्यालय द्वारा शिक्षित बेरोजगारों को कार्यालय बुलाकर वाउचर बनाकर राशि भुगतान की जाती थी और वाउचर पर साइन कराया जाता था। महतो के अनुसार सिर्फ मधुबनी जिले में 6655 शिक्षित बेरोजगार पंजीकृत थे। योजना का मध्य संख्या 2230 था। इस पूरे मामले को लेकर शिक्षित बेरोजगार संघ अब पटना उच्च न्यायालय में लोक हित याचिका PIL दायर करने की तैयारी कर रहा है। संघ की मांग है कि इस घोटाले की उच्च स्तरीय जांच कराकर दोषियों पर कार्रवाई की जाए।



