बिहार

अहीर रेजिमेंट गठन के लिए देश स्तर पर लड़ी जाएगी लड़ाई: जिलाध्यक्ष

मधुबनी- 30 अप्रैल। अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा के जिलाध्यक्ष पवन यादव ने कहा कि सेना में अहीर रेजीमेंट का इतिहास गौरवशाली रहा है।अहीर रेजिमेंट का गठन की मांग की लड़ाई जारी रहेगी। इसके लिए महासभा द्वारा देश स्तर पर सरकार का ध्यान आकृष्ट करेंगी। उन्होंने कहा कि रेजांग ला की लड़ाई में 117 अहीर सैनिकों की शौर्य को भुलाया नहीं जा सकता है। यह सभी जवान कुमाऊं रेजीमेंट की 13वीं बटालियन के हिस्सा थे। इन जवानों की वीरता के सामने चीन के सैनिकों को झुकना पड़ा था। इसके बाद भारतीय सेना ने रेजांग ला चौकी बचा ली थी। इस लड़ाई में 120 सैनिकों ने चीन के 400 सैनिकों को मार गिराया था। वहीं 117 जवान शहीद हो गए थे जिसमें 114 अहीर थे।

उन्होंने बताया कि साल 2022 में 15 मार्च को सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने संसद में अहीर रेजीमेंट की मांग उठाया था। मध्य प्रदेश के कांग्रेस के नेता अरुण यादव ने भी अहीर रेजिमेंट की मांग की थी। उन्होंने बताया कि भारतीय सेना में अलग-अलग रेजिमेंट हैं। सिख रेजिमेंट, गोरखा रेजिमेंट, राजपूत रेजिमेंट, मराठा रेजिमेंट व अन्य सेना टुकड़ियां होती हैं। इन सभी टुकड़ियों को मिलाकर सेना कंप्लीट होती है। उन्होंने कहा कि सेना में रेजिमेंट का बंटवारा ब्रिटिश काल में ही हुआ था। तब अंग्रेजों ने आवश्यकतानुसार अलग-अलग ग्रुपों में सेना में भर्ती की। कभी यह भर्तियां जाति के आधार पर हुईं तो कभी समुदाय के आधार पर। इसी बेस पर रेजिमेंट बन गई। थलसेना में भी इंफेंट्री में ही यह रेजिमेंट देखने को मिलती है।

उन्होंने बताया कि अंग्रेज भारत में आए तो व्यापार से शुरुआत करने के बाद यहीं के लोगों को सेना में भर्ती करने लगे। साल 1857 की क्रांति के बाद जाति के आधार पर रेजिमेंट का जोर बढ़ने लगा। युद्ध में हिस्सा लेती आ रही थीं। इन्हें मार्शल और नान मार्शल के आधार पर बांटा गया। मार्शल के तौर पर राजपूत, सिख, गोरखा, डोगरा, पठान, बलोच को सेना में शामिल किया गया। इस कैटेगरी के लोग लड़ाइयों में हिस्सा लेते थे। अंग्रेज इन सैनिकों के चयन के वक्त जाति पर इस वजह से जोर देते थे, जिससे उन्हें पता रहे कि लड़ाई में उनके लिए कौन बेहतर भूमिका निभाएगा। उन्होंने बताया कि आजादी के बाद भी यह सिस्टम बना रहा, लेकिन उसके बाद से अभी तक जाति के आधार पर कोई नई रेजिमेंट नहीं बनी है।

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