
मिथिला में 3 अक्टूबर को जीतिया पर्व: जानें क्यों खाई जाती है मछली-मरुआ, क्या है ओठगन – पं. ऋषिनाथ झा
मधुबनी- 28 सितंबर। मिथिला के महापर्व जीतिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत इस वर्ष 3 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस संबंध में जानकारी देते हुए पं. ऋषिनाथ झा ने बताया कि आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में रखे जाने वाले इस व्रत का नहाय-खाय 2 अक्टूबर को होगा, जब मिथिला की परंपरा के अनुसार व्रती माताएं मछली-मरुआ का भोजन करेंगी। मान्यता है कि मछली संतान और समृद्धि का प्रतीक है। मुख्य निर्जला व्रत 3 अक्टूबर को रखा जाएगा और 4 अक्टूबर को सुबह बाद नवमी तिथि में पारण होगा।
पं. झा ने बताया कि नहाय-खाय की रात अंतिम पहर में ओठगन किया जाता है। इस बार ओठगन सूर्योदय से पहले तक करना है। इसके बाद माताएं 24 घंटे का कठोर निर्जला व्रत रखेंगी।
उन्होंने बताया कि 3 अक्टूबर को कुशा से बनी जीमूतवाहन, चील और सियारिन की प्रतिमा की पूजा होगी। इस व्रत की कथा गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन से जुड़ी है। भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में इसका उल्लेख है।
पौराणिक कथा के अनुसार, दयालु राजकुमार जीमूतवाहन युवावस्था में राज-पाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने लगे। वहां उन्हें विलाप करती एक नागवंशी वृद्धा मिली, जिसके इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी गरुड़ के आहार के लिए आई थी। जीमूतवाहन ने स्वयं को लाल वस्त्र में लपेटकर शिला पर समर्पित कर दिया। उनके त्याग से प्रसन्न होकर गरुड़ ने उन्हें जीवनदान दिया और भविष्य में नागों का भक्षण न करने का वरदान दिया।
- पं. झा ने कहा कि तभी से माताएं संतान की लंबी आयु और मंगल के लिए जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
मिथिला में मिट्टी और गोबर से बनी चील-सियारिन की प्रतिमा संयम और निष्ठा का प्रतीक मानी जाती है। मान्यता है कि बिना कथा श्रवण के यह व्रत अधूरा है।



