
आस्था का सावन : भगवान शिव के त्रिशूल, डमरू और नागराज वासुकि श्रद्धालुओं के लिए बडा संदेश: पं. शंभूनाथ झा
मधुबनी- 09 अगस्त। भगवान शिव का स्वरूप सभी देवी-देवताओं से अलग है। भगवान शिव श्रृंगार के रूप में त्रिशूल, डमरू और नाग धारण किए हैं। भगवान शिव का त्रिशूल को सतोगुण,रजोगुण और तमोगुण का प्रतीक माना जाता है।सावन मास के महत्व पर चर्चा करते हुए अंतरराष्ट्रीय फेस रीडर व प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. शंभूनाथ झा ने कहा कि त्रिशूल से यह सीख मिलती है कि जीवन में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तरों पर संतुलन होना चाहिए। अहंकार के त्याग से भगवान शिव को प्राप्त किया जा सकता है। त्रिशूल को धारण करने से बुराइयों और अहंकार का नाश होता है। पं. झा ने कहा कि भगवान शिव अपने गले में नाग देवता को धारण किए हैं। सांप को विष, क्रोध और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इससे यह सीख मिलता है कि भगवान शिव ने क्रोध, वासना और ईर्ष्या को अपने काबू में कर लिया है।
समुद्र मंथन के दौरान नागराज वासुकि की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें आभूषण के रूप में स्थान दिया, जिसके बाद से ही भगवान शिव आभूषण के रूप में अपने गले में नाग देवता को धारण किए हुए हैं। पं. झा ने कहा कि भगवान शिव के डमरू को ब्रह्मांड की उत्पत्ति और लय का प्रतीक माना जाता है। डमरू को सृष्टि का पहला वाद्य यंत्र माना जाता है। डमरू को बजाने से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। आसपास का वातावरण शुद्ध होता है। भगवान शिव ने पहली बार डमरू बजाया तो उस ध्वनि से संपूर्ण ब्रह्मांड, संगीत के स्वर की उत्पति हुई थी।
भगवान शिव भक्तों की कामना क्षण भर में पूरी करते है। भगवान भोलेनाथ की महिमा का कोई छोर नहीं है। सावन के पवित्र महीने में उनकी कृपा बढ़ जाती है। भगवान शिव महादेव, भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र और नीलकंठ आदि नाम से पूजे जाते है। वेद में इनका नाम रुद्र है, यह व्यक्ति की चेतना को पढ़ लेते हैं।



