
दिल्ली में महेंद्र मलंगिया महोत्सव में ‘लक्ष्मण रेखा खंडित’ नाटक का मंचन करेंगे मधुबनी के रंगकर्मी
मधुबनी- 19 अप्रैल। देश-विदेश में रह रहे नाट्य प्रेमियों की नजर दिल्ली में 24 से 28 अप्रैल तक होने वाले चतुर्थ अन्तर्राष्ट्रीय मलंगिया महोत्सव टिकी हुई है। गांधी दर्शन व गांधी स्मृति, राजघाट, नई दिल्ली में प्रस्तावित महोत्सव में महेंद्र मलंगिया रचित 35 नाटकों का मंचन भारत और नेपाल के 35 अलग-अलग चर्चित संस्थाओं द्वारा किया जाएगा। इसमें मधुबनी के लोकहित रंगपीठ सेवा संस्थान भी शामिल होंगे। महेंद्र मलंगिया लिखित नाटक ‘लक्ष्मण रेखा खंडित’ का मंचन रंगकर्मी व निर्देशक महेंद्र लाल कर्ण के निर्देशन में मल्लर सभागार में 25 अप्रैल को किया जाएगा।
इसको लेकर मधुबनी में रंगकर्मियों ने लगातार अभ्यास कर रहे है।नाट्यशास्त्र व हिंदी साहित्य से एमए निर्देशक महेंद्र लाल कर्ण बिहार सरकार कला संस्कृति विभाग द्वारा 1986/87 में कालिदास रंगालय, पटना सहित कई महोत्सव, ब्रह्मानंद कला महाविद्यालय दरभंगाक बैनर अंतर्गत गा भैरवी नाटक में अभिनय से छाप छोड़ चुके हैं। वर्ष 1991 मधुबनी मे रंगपीठ नाट्य संस्थानक स्थापना आ आधे-अधूरे नाटक के निर्देशन सह अभिनय से मधुबनी रंगमंच पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब हो चुके हैं।
लक्ष्मण रेखा खंडित 1969 ई में लिखा महेन्द्र मलंगिया का यह पहला नाटक है जो तीन अंकों में है। नारी प्रताड़ना पर आधारित यह नाटक सामाजिक कुरीतियों पर करारा प्रहार करती है। उमा नायिका (अंजली कुमारी) बाल विधवा है। सास (रमेश कुमार मंडल) की प्रताड़ना को उमा सहती है। सास द्वारा उसे अपने ही पति को खा जाने, उसका ससुराल आगमन और पति का मौत हो जाना उसे खराब नजर वाली सिद्ध करती है। समाज के लोगों की भी उस पर बुरी नजर है। सभी उसे अपनी हवस का शिकार बनाना चाहते हैं। उस पर तरह तरह के लांक्षण लगाए जाते हैं। अंततः उसे घर से भगा दिया जाता है। तब वह गांव के ही एक महात्मा (मनोज कुमार राम आजाद) के कुटी में आसरा पाती है। यहां भी महात्मा अवसर देख उसे अपने हवस का शिकार बनाना चाहता है।
खलनायक महेश (मनजीत कुमार) भी शुरू से ही उसे पाने के लिए हर कुत्सित प्रयास करता है। नायिका उमा आत्महत्या करने का प्रयास करती है किंतु ऐन वक्त पर शंकर (नायक अनिल कुमार मिश्र)) उसे आत्महत्या करने से रोकता है और उसे अपने घर में शरण देता है। उमा को पुनर्विवाह के लिए तैयार करना चाहता है जिसे उमा सिरे से खारिज कर देती है।शंकर द्वारा उमा को घर में शरण देने के कारण पिता सोनेलाल (हर्षित आर्यन) नाराज होता है, बेटे को तरह-तरह से समझाने का प्रयास करता है। समाज में उसकी प्रतिष्ठा है। उसे इसकी ज्यादा फिक्र है। वह विधवा उमा को अपने घर से भगा देना चाहता है और अंततः उसे भगा देता है। इस पर पुत्र शंकर की बहसबाजी हो जाती है और वह भी घर छोड़ देता है। शंकर का दोस्त मनोज (राहुल कुमार) हर कदम शंकर को साथ देता है। इधर उमा को घर से भगाए जाने के बाद खलनायक महेश और उसके गुंडे उमा को घेर लेते हैं, शंकर को मारते पीटते हैं, शंकर के पिता सोनेलाल को भी मारा पीटा जाता है, तब तक मनोज दरोगा और पुलिस को ले आता है। गुंडे भाग जाते हैं, खलनायक महेश को गिरफ्तार किया जाता है। यही पिता सोनेलाल द्वारा उमा और शंकर से अपने द्वारा किए कृत्य के लिए क्षमा करने को कहता है।
दरोगा पुलिस की उपस्थिति में शंकर और उमा का विवाह के लिए स्वीकृति देता है।अन्य पात्र की भूमिका में हर्ष कुमार आर्य, सुजीत कुमार बादल, आलोक कुमार, आदित्य कुमार शामिल हैं। संगीत शिवनारायण मिश्र का और निर्देशन मनजीत कुमार गुप्ता का है। नाटक के प्रस्तुतकर्ता प्रो महेन्द्र लाल कर्ण है।



