
MADHUBANI: बलिराजगढ़ के पुरातात्विक उत्खनन को मिली स्वीकृति, मिथिला की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को मिलेगी पहचान
मधुबनी, 27 फरवरी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत संरक्षित स्मारक बिहार में मधुबनी जिले के प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल बलिराजगढ़ का उत्खनन कराई जाएगी। यह निर्णय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा लिया गया है। इस निर्णय के आलोक में पटना सर्किल के अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ हरिओम शरण के निदेशन में यह उत्खनन कराया जाएगा। इससे मिथिला की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत सामने आएगी। बता दें कि बिहार की विशालतम पुरातात्विक स्थल बलिराजगढ़ के उत्खनन के लिए दशकों से मांग की जा रही थी। इन्टैक बिहार स्टेट के को-कन्वेनर एवं पुरातत्वविद् डा. शिव कुमार मिश्र ने बताया कि बलिराजगढ़ के पुरातात्विक उत्खनन से धरती के गर्भ में छुपी मिथिला की इतिहास एवं गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत उजागर होगी। इससे पूर्व वर्ष 1962 एवं 2013-14 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा उत्खनन कराया गया था। बिहार सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय द्वारा भी वर्ष 1972-73 एवं 1974-75 में उत्खनन कराया गया था। सभी उत्खनन सांकेतिक रूप से ही कराया गया। जिसमें एनबीपी संस्कृति के साक्ष्य प्राप्त हुए थे। पूर्व के उत्खननों से प्राप्त सामग्रियों के आधार पर कहा जा सकता है कि साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व यहां कोई विकसित शहर बसा हुआ था। बता दें कि बलिराजगढ़ की विशाल चहारदीवारी एवं परिसर से माना जाता है कि यहां कोई बड़े राजाओं की राजधानी रही होगी। रामायण में वर्णित मिथिला के जनकवंशी राजाओं की राजधानी बलिराजगढ़ में होने की संभावना है। वाल्मीकि रामायण में वर्णित है कि राम, लक्ष्मण एवं गुरु विश्वामित्र गौतम आश्रम से ईशान कोण में चलकर राजा जनक के यज्ञमंडप पहुंचे थे। बलिराजगढ़ के पुरातात्विक उत्खनन के लिए राजनेताओं एवं बुद्धिजीवियों द्वारा अनेक स्तरों से प्रयास किए जा रहे थे। मैथिली साहित्य संस्थान, पटना के सदस्य एवं पटना उच्च न्यायालय के अधिवक्ता सुनील कुमार कर्ण द्वारा पटना उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर किया गया था। इन्टैक पटना चैप्टर के कन्वेनर भैरव लाल दास एवं पुराविद् डा शिव कुमार मिश्र ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि बलिराजगढ़ का संपूर्ण उत्खनन होना चाहिए तथा प्राप्त पुरावशेषों को संरक्षित करने हेतु साइट म्यूजियम स्थापित किया जाना चाहिए। पूर्व के उत्खननों के रिपोर्ट भी यथाशीघ्र प्रकाशित होना चाहिए जिससे कि प्राप्त पुरावशेषों की जानकारी प्राप्त हो सके।



