
पितृपक्ष में पितरों को दिया जाता जल? 26 सितंबर से शुरू हो रहा पितृपक्ष : पं. शंभूनाथ झा
मधुुबनी – 31 अगस्त। इस साल पितृपक्ष 26 सितंबर से शुरू होकर 10 अक्टूबर सर्वपितृ अमावस्या तक चलेगा। पितृपक्ष में लाखों लोग अपने पितरों को नदी किनारे जल अर्पित करेंगे। धर्मशास्त्रों के अनुसार पितरों का निवास चंद्रलोक में है और मनुष्य का पृथ्वी पर। इन दोनों लोकों के बीच आत्मा बिना आधार के यात्रा नहीं कर सकती। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि ‘आपो वै प्राणा’ अर्थात जल ही प्राण है। पितृपक्ष की धार्मिक महत्व की जानकारी देते हुए विश्व प्रसिद्ध फेस रीडर व ज्योतिषाचार्य पं. शंभूनाथ झा ने बताया कि पितृपक्ष के दौरान जब संतान काले तिल, कुश और मंत्रों के साथ पवित्र नदी के जल को अर्पित करती है, तो वही जल पितरों के लिए अमृत बन जाता है। तिल पितरों का अन्न है, और जल उस अन्न को पितरों तक ले जाने वाला वाहन।
ज्योतिष में पितरों का संबंध चंद्रमा से है और चंद्रमा जल का स्वामी है। नदी किनारे दिया गया जल सीधे चंद्रमा के द्वारा पितरों तक पहुंचता है। गरुड़ पुराण पितृपक्ष में गया, प्रयाग और मिथिला की कोसी-गंडक-कमला नदियों में तर्पण का सौ गुना फल बताया गया है। उन्होंने बताया कि मार्कंडेय पुराण के अनुसार जो पुत्र पवित्र नदी के किनारे पितरों को जल देता है, उसके 21 पीढ़ी के पितर तर जाते हैं। महाभारत अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को बताया था कि पितृपक्ष में जल-तर्पण से बढ़कर कोई दान नहीं। मनुस्मृति में मनु महाराज कहते हैं जल के बिना श्राद्ध अधूरा है। नदी के जल में किया गया तर्पण सौ गाय दान के बराबर है। ब्रह्म और मत्स्य पुराण में नदियों के संगम पर पितरों को जल देने से पितृ ऋण और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। उन्होंने बताया कि कोसी, गंडक, कमला किनारे दिया गया जल पितरों को मोक्ष देता है। परिवार में सुख-समृद्धि लाता है। पितृपक्ष पितरों को मोक्ष दिलाने का सबसे पवित्र समय माना गया है। पंडितों द्वारा बोले जाने वाले 3 सिद्ध मंत्र और उनका अर्थ तर्पण का मुख्य मंत्र – ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः, पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। भावार्थ – जो पितर स्वधा देवी के साथ रहते हैं, उन पितरों और पितामहों को स्वधा के साथ नमस्कार करते हुए यह जल अर्पित करता हूं। दूसरा पितरों के आवाहन का मंत्र – ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु जलाञ्जलिम्। भावार्थ – हे मेरे पितर! आप यहां पधारें और मेरे द्वारा प्रेम से दी गई इस जल की अंजलि को स्वीकार करें। तीसरा मोक्ष का महामंत्र – ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव नमो नमः। भावार्थ – सभी देवताओं, पितरों और महान योगियों को प्रणाम है। स्वधा (पितरों की शक्ति) और स्वाहा (देवताओं की शक्ति) को मैं हमेशा बार-बार नमन करता हूं। पंडितों के अनुसार पूर्व दिशा की ओर मुख करके, जनेऊ दाहिने कंधे पर करके, काले तिल और कुश के साथ ये मंत्र बोलने से ही जल पितरों तक पहुंचता है।



