बिहार

मिथिला की विश्व प्रसिद्ध सौराठ में इस साल 2 जुलाई से सजेगी दूल्हों की सभा

मधुबनी- 22 अप्रैल। मैथिल ब्राह्मणों का वैवाहिक निर्धारण स्थल मधुबनी जिले के सौराठ में इस साल 2 जुलाई से सौराठ सभा का शुभारंभ श्रीरामचरितमानस पाठ से होगा।12 जुलाई तक चलने वाली सौराठ सभा में पहुंचने वाले वर-कन्या पक्ष के लोग पंजीकारों से पूर्वजों का पंजी मिलान कराकर वर-कन्या का विवाह कराएंगे। बता दें कि मिथिला में मैथिल ब्राह्मणों के बीच सौराठ सभा वर-कन्या के विवाह पूर्व पूर्वजों का मूल, गोत्र का मिलान की प्राचीन परंपरा रही है। सभा में वर-कन्या पक्ष के पूर्वजों के मूल-गोत्र का मिलान किए जाने के विवाह की सहमती दी जाती है। पंजी मिलान के दौरान वर-कन्या के पूर्वजों का मूल-गोत्र एक समान (समगोत्र) होने पर विवाह से बचने का निर्देश दिया जाता है।

सौराठ सभा में वर का सिद्धांत के लिए भारत-नेपाल से पहुंचते मैथिल ब्राह्मण: पंजीकार प्रमोद कुमार मिश्र

 

सौराठ सभा के पंजीकार प्रमोद कुमार मिश्र ने बताया कि सौराठ सभा में वर का सिद्धांत (लगन) के लिए दरभंगा, सीतामढ़ी, समस्तीपुर, बेगूसराय, बेतिया, पूर्णिया, कटिहार व मुजफ्फरपुर के अलावा नेपाल से मैथिल ब्राह्मण पहुंचे है। वर्ष 2025 में सौराठ सभा में सैकड़ों वर का सिद्धांत कराया गया। इस आयोजन में हर वर्ष देश-विदेश से लोग पहुंचते हैं। सौराठ सभा पहुंचने वाले दूरदराज के लोगों के लिए दो धर्मशाला का निर्माण कराया गया। स्नान के लिए तालाब का निर्माण कराया गया है। सौराठ सभा में वर-कन्या पक्ष के लोगों की भागीदारी के लिए सौराठ सभा समिति की ओर से जागरूकता अभियान चलाया जाता है। समिति के सचिव डा. शेखरचन्द्र मिश्र ने बताया कि इस साल 2 से 12 जुलाई से शुरु होने वाले सभावास की तैयारी शुरु होगई है।

सौराठ सभा में धोती-कुर्ता और पाग पहनकर पहुंचे वर-कन्या पक्ष : मोद नारायण झा

मैथिल विकास समिति के उपाध्यक्ष मोद नारायण झा ने बताया कि सौराठ सभा पहुंचने वाले वर-कन्या पक्ष का 100 से 500 साल के पूर्वजों का पंजी का मिलान आधा से एक घंटा के अंदर कर दिया जाता है। जिसके आधार पर सिद्धांत तय किए जाते हैं।सभा स्थल पहुंचने वाले वर व कन्या पक्ष के लोग मिथिला की परंपरा की अनुसार धोती-कुर्ता में पाग पहने होते हैं। सफल वैवाहिक जीवन के लिए वर-कन्या पक्ष के मूल-गोत्र का मिलान किया जाना जरुरी होता है। मेडिकल साइंस भी एक समान मूल-गोत्र में विवाह को वर्जित माना है।

14वीं शताब्दी में हुई थी सौराठ सभा की शुरुआत : पं. ऋषिनाथ झा

पं. ऋषिनाथ झा ने बताया कि सौराठ सभा की शुरुआत 14वीं शताब्दी में हुई थी। तब पंजी प्रथा का प्रचलन नहीं था। लोग छिटपुट वंश परिचय रखते थे। वैवाहिक अधिकार का निर्णय स्मरण के आधार पर करते थे। बाद में पंजी प्रबंध बना। मिथिला अक्षर में पंजीकार वंश परिचय का अभिलेख रखने लगे। साल 1735 में दरभंगा राज के महाराज राजा माधेश्वरनाथ सिंह द्वारा सौराठ गांव में सभा की शुरुआत कराई गई। सौराठ सभा के लिए राज दरभंगा द्वारा माधेश्वरनाथ ट्रस्ट के नाम पर 22 बीघा जमीन उपलब्ध कराई गई। सौराठ सभा स्थल परिसर में माधेश्वरनाथ शिवालय, तालाब, पंजीकार के लिए मंडप का निर्माण कराया गया है। पूर्व में सौराठ सभा में देश के विभिन्न भागों के गुरुकुल से गुरु व शिष्य यहां पहुंचते थे। शास्त्रार्थ की परंपरा थी। अभिभावक अपनी बेटियों के लिए शिष्यों में से योग्य वर का चुनाव करते थे।

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