
महाकवि विद्यापति रचित 16 पांडुलिपियों की खोज और शोध जरुरी : मोद नारायण झा
मधुबनी- 20 अप्रैल। मैथिल विकास प्रतिष्ठान के उपाध्यक्ष मोद नारायण झा ने कहा कि महाकवि विद्यापति रचित 16 पुस्तकों का एक भी पांडुलिपि बिहार में नहीं है। इन सभी पांडुलिपियों की खोजकर उसपर शोध की पहल होना चाहिए। अब तक सैकडों साहित्यकारों द्वारा महाकवि विद्यापति की साहित्यिक और शिक्षा पर हजारों पुस्तके लिखी गई है। इसके बाद भी उनकी अनेक रचनाएं सामने नहीं आ सका है।उन्होंने कहा कि विद्यापति की रचनाएं हिन्दी, अंग्रेजी के अलावा विदेशी भाषाओं में भी प्रकाशित हुई है। न्याय दर्शन के लिए कभी देशभर के लोग मिथिला आते थे।
वैष्णव संप्रदाय के लोग भी विद्यापति को मानते थे। नेपाल के लोग विद्यापति को भगवान के रूप में मानते हैं। महाकवि विद्यापति आम लोगों की पीड़ाओं को अपनी रचनाओं में जगह देते थे। विद्यापति की रचनाओं में निश्चल व अद्भुत प्रेम का उल्लेख मिलता है। उनकी रचनाएं नारी शक्ति को बल प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि मिथिला की मातृ भाषा मैथिली समाज को जोड़ती है। महाकवि विद्यापति ने सामाजिक चेतना जागृत किया। समाजिक भाषा के महत्व को देखते हुए महाकवि विद्यापति ने मैथिली में गीतों की रचना कर सामाजिक एकता, प्रेम, संस्कृति की रक्षा को भाषा में बांधने में सफलता हासिल की। मैथिली में लिखी गई गीतों व अन्य रचनाओं को खास से लेकर आम लोगों ने अपनाया। महाकवि विद्यापति ने तीन भाषा में पुस्तक की रचना की। जिसमें संस्कृत, अवहट्ठ और मैथिली शामिल है।
विद्यापति मुख्य रुप से मैथिली भाषा के रुप में जाने जाते हैं। समाज के हरेक वर्ग के बच्चा-बच्चा विद्यापति रचित गीत को विभिन्न अवसरों पर गाते हैं। सात सौ वर्ष पूर्व मैथिली भाषा का उत्थान, संरक्षण, संवर्धन, सदभावना को बनाए रखने के लिए अपनी भाषा की महत्ता को जाना गया। मैथिली की रचनाएं देश ही नहीं विदेशों में रह रहे लोगों के बीच आज सुलभता से पहुंच गई है। उन्होंने कहा कि महाकवि विद्यापति लोक भाषा के आदि रचनाकार थे। विद्यापति की रचना आज भी प्रासंगिक है। महाकवि विद्यापति रचना के माध्यम से समाज से कुरीतियों से दूर रहने की सीख दी। महाकवि ने अपनी रचना से बाल विवाह व समाज की कुरीतियों पर प्रहार किया।



