
MADHUBANI: हाकिमों की संलिप्ता के बिना सरकारी जमीन की खरीद-फरोख्त और हेरा-फेरी संभव नहीं
मधुबनी – 27 जुलाई। पोखर-जलकर और अन्य सरकारी जमीन की चर्चा चलते ही लोगों के बीच नगर निगम क्षेत्र की अतिक्रमित 32 सरकारी तालाबों की शोर सुनाई देने लगती है। इधर, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी हरेक जिलों में सरकारी जमीन के अतिक्रमणकारियों और भू-माफियाओं को चिन्हित कर उनपर नकेल कसने की बात कह चुके है। सवाल है कि भू-माफियाओं को चिन्हित करने का पैमाना क्या होगा। दरअसल, भू-माफियाओं को चिन्हित करने के साथ-साथ इन्हें बढ़ावा देकर अपनी तिजोरी भरने वाले हाकिमों, राजस्व कर्मचारियों और कार्यालयों के बाबूओं की भूमिका को जांच के दायरे में लाना होगा। जानकारों का माने तो हाकिमों की संलिप्ता के बगैर सरकारी जमीन की खरीद-फरोख्त, हेरा-फेरी संभव नहीं हो सकता। हाकिमों के कार्यकलापों की पड़ताल से स्पष्ट हो सकता है कि भू-माफियाओं का तार हाकिमों से जुड़ा होता है। हाकिम भू-माफियाओं के पक्ष में कार्य करते हुए अपने जेब गरम करते रहे है। जिससे अधिकांश सरकारी विवादित जमीन पर दखल-कब्जा को लेकर पुलिस प्रशासन की कार्यशैली सवालों के घेरा में रहा है। विवादित सरकारी जमीन का मामला कानूनी दायरे में आने पर भू-माफियाओं को बढ़ावा देने वाले हाकिमों कानूनी कार्रवाई से बच निकलते है। भू-माफियाओं को बढ़ावा देने में राजस्व विभाग और जमीन पर कब्जा में पुलिस प्रशासन की भूमिका को सीधे तौर पर नकारा नहीं जा सकता है। इधर, जिला मत्स्य विभाग की सैरात सूची में शामिल शहर में अतिक्रमित 32 पोखरों का सीमांकन कर अतिक्रमण मुक्त कराने का समय-समय पर हाकिमों द्वारा ढिंढोरा पीटा जाता है, लेकिन धरातल पर ठोस कार्रवाई होते नहीं देखा जाता है। मजे की बात तो यह है कि अतिक्रमित जमीन की मापी की प्रकिया कमाई का जरिया बन जाता है। अतिक्रमित तालाबों या अन्य सरकारी भूमि का सीमांकन के लिए अमीन तैनात किए जाते है। मापी के बाद नोटिस निर्गत की जाती है। फिर हाकिमों को चढावा चढाने का दौर शुरु हो जाता है। एक-दो माह में मामला ठंडा पड़ जाता है। इसका एक नमूना के तौर पर मत्स्य विभाग के तहत शहर के कीर्तन भवन तालाब को देखा जा सकता है। इस तालाब के चहुंओर भिंडा की जमीन पर आलीशान बिल्डिंग खड़ा कर दिए गए और रहिका अंचल प्रशासन देखता रह गया। पिछले पांच साल में इस तालाब के पूरव कीर्तन भवन होकर टाउन क्लब मैदान जाने वाली सड़क के किनारे तालाब भरकर कई मंजिल भवनों का निर्माण करा लिया गया। आज भी तालाब भराई जा रही है। इसके बाद भी मत्स्य विभाग और रहिका अंचल प्रशासन मौन है। वहीं, चकदह गुलटेनी पोखर सहित मत्स्य विभाग की 32 पोखर-जलकरों का अतिक्रमण बढ़ता गया। देखा जाए तो सरकारी तालाबों को अतिक्रमण होने से बचाने की बजाय अतिक्रमणकारियों को संरक्षण मिलता रहा है।



