
आस्था का सावन : भगवान शिव ने जगत कल्याण के लिए धारण किया डमरू, ब्रह्मांड की पहली ध्वनि ‘ॐ’ और भाषा के आरंभ का प्रतीक है डमरू
मधुबनी- 07 अगस्त। भगवान शिव ने जगत कल्याण हेतु डमरू धारण किया है। ब्रह्मांड की पहली ध्वनि ‘ॐ’ और भाषा के आरंभ का प्रतीक डमरू की मदद से भगवान शिव ने कालचक्र यानी समय को एक लय में संतुलित किया हैं। डमरू एक वाद्य यंत्र है। सन्यासी अपने साथ डमरू रखते हैं। इसके अलावा शिव भक्त घरों में डमरू रखते हैं। डमरू शंकु आकार में होता है। इसके दोनों विपरीत दिशा में रस्सी बंधी होती है। इससे मधुर आवाज निकलती है, जिसमें चौदह तरह के लय होते हैं। इसकी आवाज डुग-डुग के रूप में निकलती है।
सावन के महत्व पर चर्चा करते हुए पं. ऋषिनाथ झा कहते है कि सनातन शास्त्रों के अनुसार त्रिदेव भगवान शिव ने सृष्टि की रचना की। उस समय समस्त लोक में मौन व्याप्त था। तब ब्रह्मा ने भगवान शिव एवं भगवान विष्णु से अनुमति लेकर अपने कमंडल से अंजलि में जल लिया और मंत्र उच्चारण कर जल को धरा पर छिड़क दिया। इससे धरा पर कंपन होने लगा। उसी स्थान पर स्थित एक वृक्ष से चतुर्भुजी शक्ति स्वरूपा मां शारदे का प्रादुर्भाव हुआ। मां के एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में पुस्तक और तीसरे हाथ में माला है। वहीं, चौथा हाथ वर मुद्रा में है। मां शारदे ने त्रिदेव का अभिवादन कर मधुर नाद किया। इससे समस्त लोक में चंचलता व्याप्त हो गई। जिससे भगवान शिव प्रसन्न हुए। इसके बाद उन्होंने मधुर नाद को लय प्रदान करने के लिए अपना डमरू बजाया। इससे सुर और संगीत को लय मिला। सृष्टि में लय स्थापित करने के लिए भगवान शिव का अवतरण डमरू के साथ हुआ था।
उन्होंने कहा कि घर में डमरू रखने से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। पूजा के समय डमरू बजाने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। भगवान शिव की कृपा पाने के लिए रोजाना पूजा के समय डमरू बजाना चाहिए। एक लय में डमरू बजाकर सुनने से व्यक्ति को मानसिक विकार से मुक्ति मिलती है। सनातन शास्त्रों में वर्णित है कि देवों के देव महादेव प्रसन्न होने पर डमरू बजाकर नृत्य करते हैं।



