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नेपाल के राष्ट्रपति ने संवैधानिक परिषद संबंधी अध्यादेश को दी मंजूरी

काठमांडू- 05 मई। नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने संवैधानिक परिषद से संबंधित अध्यादेश को मंगलवार को अपनी मंजूरी प्रदान कर दी। सरकार ने इस अध्यादेश को जारी करने के लिए राष्ट्रपति के समक्ष दोबारा सिफारिश की थी। इससे पहले सरकार द्वारा सिफारिश किए गए आठ अध्यादेशों में से सात को राष्ट्रपति ने मंजूरी दी थी, लेकिन संवैधानिक परिषद से संबंधित अध्यादेश को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया था। उसी अध्यादेश को सोमवार की मंत्रिपरिषद की बैठक ने बिना किसी बदलाव के फिर से जारी करने के लिए सिफारिश की थी।

अध्यादेश में प्रावधान किया गया है कि संवैधानिक परिषद की बैठक में चार सदस्य उपस्थित होने पर बैठक पूरी मानी जाएगी और उपस्थित सदस्यों के बहुमत से निर्णय लिया जा सकेगा। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में बनने वाली संवैधानिक परिषद छह सदस्यीय होती है। इसमें प्रधानमंत्री, प्रमुख विपक्षी दल के नेता, प्रधान न्यायाधीश, प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष सदस्य होते हैं।

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने राष्ट्रपति से अध्यादेश जारी करने का आग्रह करते हुए पत्र भी लिखा था। हालांकि इसके पहले राष्ट्रपति का तर्क था कि संविधान में संवैधानिक परिषद के निर्णय के लिए बहुमत प्रणाली की परिकल्पना की गई है, जबकि अध्यादेश उस मर्म से अलग तरीके से आया है। अध्यादेश लौटाते समय उन्होंने यह भी याद दिलाया था कि पहले भी संसद द्वारा पारित विधेयक वापस किए जा चुके हैं।

इसके बाद प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र में कहा गया कि ‘तत्काल बहाल’ शब्द हटाकर यह प्रावधान किया गया है कि परिषद की बैठक तभी हो सकेगी जब सभी सदस्य पद पर बहाल हों। साथ ही गणपूर्ति (कोरम) के लिए कम से कम चार सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य की गई है।

इससे पहले राष्ट्रपति ने यह तर्क दिया था कि छह सदस्यीय संवैधानिक परिषद में केवल तीन सदस्यों द्वारा निर्णय लेने या परिषद के सदस्यों के पद रिक्त रहने की स्थिति की कल्पना नहीं की जा सकती। इस पर प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि वर्तमान अध्यादेश में ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की गई है।

प्रधानमंत्री के अनुसार परिषद की बैठक तभी संभव होगी जब सभी छह सदस्य पद पर बहाल हों। यदि कोई सदस्य पद रिक्त हो, तो उस स्थिति को इस अध्यादेश में शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि सभी सदस्य पद पर होने के बावजूद बैठक में उपस्थित नहीं होते हैं, तो ऐसी स्थिति में बैठक के लिए आवश्यक गणपूर्ति संख्या निर्धारित की गई है।

अब, यदि छह में से चार सदस्य उपस्थित होते हैं, तो उसे गणपूर्ति माना जाएगा और उपस्थित सदस्यों के बहुमत—यानी कम से कम तीन—से निर्णय लिया जा सकेगा।

चूंकि परिषद में कुल छह सदस्य (सम संख्या) हैं, इसलिए निर्णय में बराबरी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में यदि तीन-तीन मत हो जाएं, तो परिषद के अध्यक्ष (प्रधानमंत्री) के पक्ष को बहुमत माना जाएगा—ऐसी व्यवस्था करना आवश्यक बताया गया है।

प्रधानमंत्री का तर्क है कि यदि सर्वसम्मति संभव न हो, तो बहुमत से निर्णय लेना उचित है, इसलिए इस कानूनी प्रावधान को शामिल किया गया है।

सरकार के मुताबिक अध्यादेश में उल्लिखित विषयों की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए पुनर्विचार के बाद भी इसे यथावत रूप में जारी करना आवश्यक पाया गया, इसलिए मंत्रिपरिषद के निर्णय के अनुसार प्रधानमंत्री ने इसे उसी रूप में जारी करने की सिफारिश की।

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