
नवरात्र के दूसरे दिन होती है मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, जानिए उत्पत्ति, स्वरूप और महत्व : पं. ऋषिनाथ झा
मधुबनी- 12 अक्टूबर। शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन आज मां दुर्गा के द्वितीय स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना की जा रही है। शास्त्रों के अनुसार मां ब्रह्मचारिणी ज्ञान, तप और वैराग्य की देवी हैं। मधुबनी के सभी दुर्गा मंदिरों में मां ब्रह्मचारिणी की विशेष आराधना के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी है।
उत्पत्ति की कथा—
पं. ऋषिनाथ झा कहते है कि पौराणिक मान्यता के अनुसार हिमालय की पुत्री पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। हजारों वर्षों तक उन्होंने कठिन तप किया, केवल फल-फूल खाकर और फिर बेलपत्र खाकर रहीं। अंत में निराहार रहकर तप करने के कारण उनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी का अर्थ है आचरण करने वाली। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
स्वरूप— मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और तपस्वी है। मां के एक हाथ में जप की माला और दूसरे हाथ में कमंडल है। वे सफेद वस्त्र धारण करती हैं और उनका यह रूप साधक को संयम और आत्मबल का संदेश देता है।
पूजा विधि—मां ब्रह्मचारिणी को सफेद फूल, अक्षत, रोली, चंदन अर्पित करें। मां को चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन चीनी का भोग लगाने से आयु में वृद्धि होती है।
मंत्र— या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
_दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
महत्व और फल— शास्त्रों में कहा गया है कि मां ब्रह्मचारिणी की उपासना से साधक में तप, त्याग, वैराग्य और सदाचार की भावना बढ़ती है। विद्यार्थियों और साधकों के लिए इनकी पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। इनकी कृपा से असफलता, मानसिक तनाव और भय दूर होता है। जीवन में सफलता, धैर्य और आत्मविश्वास की प्राप्ति होती है।



