
आस्था का सावन : सावन का महीना भगवान शिव को सबसे प्रिय, विष ग्रहण कर की सृष्टि की रक्षा: महेश चन्द्र झा
मधुबनी- 18 अगस्त। सावन का महीना भगवान शिव को सबसे प्रिय है। मान्यता है कि इसी महीने में समुद्र मंथन से निकला विष पीकर भोलेनाथ ने पूरी सृष्टि की रक्षा की थी। तभी से सावन में जलाभिषेक का महत्व सबसे अधिक माना जाता है। सावन की महत्व पर चर्चा करते हुए महेश चन्द्र झा ने कहा कि भगवान शिव को भोलेनाथ कहा जाता है। भगवान शिव आडंबर रहित सिर्फ सच्ची श्रद्धा देखते हैं। एक लोटा जल, एक बेलपत्र, और मन से बोला गया “ॐ नमः शिवाय” ही उन्हें प्रसन्न कर देता है। शिव का स्वरूप भी यही सिखाता है। गले में विष, सिर पर गंगा, तन पर भस्म और हाथ में त्रिशूल। इसका अर्थ है विनाश के बाद ही सृजन होता है। जो जहर पी सकते हैं वही अमृत भी बांट सकते हैं। श्री झा ने कहा कि सावन में चारों तरफ हरियाली होती है। प्रकृति खुद शिव की पूजा करती है। इस महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने से मन शांत होता है। जीवन में सुख-समृद्धि आती है। मान्यता है कि सावन के सोमवार को किया गया रुद्राभिषेक पूरे साल की पूजा के बराबर फल देता है। देश भर के शिव मंदिरों में सावन भर भक्तों की कतारें लगी रहती हैं। भगवान शिव अहंकार, क्रोध और मोह का नाश करते हैं। ध्यान, संयम और करुणा से ही जीवन में शांति मिलती है।
श्री झा ने कहा कि सावन में लोग उपवास रखते हैं, शिव स्तुति करते हैं। जल चढ़ाते हैं। मान्यता है कि इससे भोलेनाथ सभी कष्ट हर लेते हैं और भक्तों की मनोकामना पूरी करते हैं।शास्त्रों में कहा गया है कि इस महीने में की गई शिव आराधना का फल कई गुना बढ़ जाता है। भगवान शिव का सबसे बड़ा गुण है उनकी सरलता। वह कैलाशवासी हैं, लेकिन रहते श्मशान में हैं। शरीर पर भस्म, गले में रुद्राक्ष और सर्प। उन्हें ‘आशुतोष’ कहा गया है जो तुरंत प्रसन्न हो जाते हैं। शिव का हर रूप हमें बड़ी सीख मिलती है। त्रिशूल : तीन गुण सत, रज, तम पर नियंत्रण, डमरू : सृष्टि की ध्वनि और नाद का प्रतीक, गंगा : पवित्रता जो सिर से बहती है, चंद्रमा : शीतलता और मन पर नियंत्रण तथा नंदी : धर्म और कर्मठता का प्रतीक है। अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मकता का विनाश करके ही जीवन में शांति आती है। सावन के सोमवार को व्रत और रुद्राभिषेक का विधान है। मान्यता है कि इस दिन शिव पार्वती की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। शिव को “रूद्र” कहा जाता है, लेकिन वो रौद्र नहीं हैं। वो “शिव” हैं यानी कल्याणकारी। वो तांडव भी करते हैं और ध्यान में भी लीन रहते हैं। शिव हमें सिखाते हैं कि जीवन में संतुलन जरूरी है। क्रोध और करुणा, शक्ति और शांति दोनों साथ चलें तभी जीवन सफल है। जरूरत है सिर्फ समर्पण की। भोलेनाथ भाव के भूखे हैं।



