
अष्टमी पर मां महागौरी की आराधना से मिलती है सिद्धि – पं. ऋषिनाथ झा
मधुबनी -18 अक्टूबर। शारदीय नवरात्र की महाअष्टमी पर मां दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। इस संबंध में प्रसिद्ध विद्वान पं. ऋषिनाथ झा ने मां दुर्गा की महिमा पर प्रकाश डाला।
पं. ऋषिनाथ झा ने बताया कि नवरात्र के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
अर्थात जो सफेद वृषभ पर सवार हैं, श्वेत वस्त्र धारण करती हैं और महादेव को आनंद देने वाली हैं, वे महागौरी सभी का कल्याण करें।
उन्होंने कहा कि पौराणिक कथा के अनुसार कठोर तपस्या से मां पार्वती का वर्ण काला पड़ गया था, तब भगवान शिव ने गंगाजल से उनका अभिषेक किया और वे विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो गईं, तभी से उनका नाम महागौरी पड़ा।
अष्टमी की महिमा पर उन्होंने कहा कि अष्टमी को ही मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर देवताओं को भय से मुक्त किया था, इसलिए इसे महापूजा और बलिदान पूजा भी कहा जाता है। इस दिन कन्या पूजन का विशेष फल है। 2 से 10 वर्ष तक की नौ कन्याओं को नौ देवियों का स्वरूप मानकर पूजन करने से मनोकामना पूर्ण होती है।
जो भक्त अष्टमी को उपवास रखकर मां महागौरी की सच्चे मन से आराधना करता है, उसके सभी पाप धुल जाते हैं और उसे अखंड सौभाग्य व सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
पं. झा ने कहा कि कलश स्थापना से लेकर नवमी तक मां के नौ रूपों की पूजा तो होती ही है, लेकिन अष्टमी और नवमी की संधि बेला में किया गया हवन सबसे फलदायी माना गया है। इस दिन माता को नारियल, चुनरी, खीर और हलवा-पूरी का भोग लगाने से मां शीघ्र प्रसन्न होती हैं।
उन्होंने कहा कि मधुबनी-मिथिला में अष्टमी को “खोइंछा भरने” की परंपरा है, जिसमें सुहागिनें मां से अपने परिवार की रक्षा का आशीर्वाद मांगती हैं।



