
शरद पूर्णिमा: आस्था, आरोग्य और आनंद का संगम, जब चंद्रमा बरसाता है अमृत – पं. ऋषिनाथ झा
मधुबनी – 25 अक्टूबर। सनातन संस्कृति में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व केवल चांद की पूजा नहीं, बल्कि प्रकृति, स्वास्थ्य और समृद्धि का उत्सव है। इसी पर्व को मिथिला में “कोजागरा पाबनि” के रूप में माता लक्ष्मी के जागरण की रात्रि के रूप में मनाया जाता है।
इस संबंध में प्रसिद्ध विद्वान और ज्योतिषाचार्य पं. ऋषिनाथ झा ने बताया कि शरद पूर्णिमा का धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही दृष्टि से अद्वितीय महत्व है।
पं. झा कहते हैं कि शास्त्रों में कहा गया है कि शरद पूर्णिमा की रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और पूछती हैं – ‘को जागर्ति?’ अर्थात कौन जाग रहा है? जो भक्त इस रात जागकर माता लक्ष्मी की पूजा करता है, उसके घर में धन-धान्य और सुख-समृद्धि का वास होता है। इसी कारण मिथिला में नवविवाहित दंपतियों के लिए कोजागरा का विशेष विधान है। इस रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है, जो अमृत वर्षा का प्रतीक है।
पं. झा के अनुसार, “शरद पूर्णिमा को ही भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था। इसलिए इसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस रात को प्रेम, भक्ति और आनंद का प्रतीक माना गया है।
पं. ऋषिनाथ झा ने बताया कि इसका महत्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी में अमृत का वास होता है। इस रात खुले आसमान में रखी गई खीर में चंद्रमा की किरणों से औषधीय गुण आ जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है। आयुर्वेद में भी माना गया है कि इस रात की चांदनी शीतलता, मन की शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है। यह मनुष्य को सिखाती है कि जैसे चांद पूर्णता को प्राप्त करता है, वैसे ही जीवन में भी धैर्य और प्रकाश के साथ पूर्णता की ओर बढ़ना चाहिए।
शरद पूर्णिमा खरीफ फसल के पकने का भी संकेत है। किसान इस रात को अपनी अच्छी फसल के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है। पं. झा ने कहा कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में शरद पूर्णिमा हमें एक रात परिवार के साथ चंद्रमा के नीचे बैठकर, शांति और एकजुटता का अनुभव करने का अवसर देती है। यह पर्व हमें अपने संस्कारों से जोड़े रखता है।



