
बिहार की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में तकनीक की क्रांति, IIT पटना के साथ MOU- अब जमीन के नीचे दबा इतिहास दिखेगा
पटना- 02 सितंबर। बिहार की ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए सम्राट सरकार ने अब तकनीक का सहारा लिया है। कला एवं संस्कृति विभाग के तहत बिहार विरासत विकास समिति और IIT पटना के बीच 01 सितंबर को एक महत्वपूर्ण MoU पर हस्ताक्षर हुआ है। यह पहल बिहार के गौरवशाली इतिहास को नई तकनीक से जोड़ने की दिशा में मील का पत्थर मानी जा रही है। इस समझौते के तहत बिहार के प्राचीन गढ़ों, टीलों और पुरातात्विक स्थलों का वैज्ञानिक अध्ययन होगा। धरोहरों की 3D मैपिंग होगी। जमीन के भीतर बिना खुदाई के ही छिपी संरचनाओं, दीवारों और अवशेषों का पता लगाया जाएगा। प्राप्त डेटा का वैज्ञानिक विश्लेषण और दस्तावेजीकरण होगा।
कला संस्कृति विभाग का दावा है कि बिहार, देश का पहला राज्य है, जिसने पुरातात्विक विरासत के लिए इतने बड़े पैमाने पर LiDAR, GPR और AI का उपयोग करने का निर्णय लिया है। विभाग के अनुसार भविष्य में IIT पटना और कला एवं संस्कृति विभाग के संयुक्त प्रयास से एक समर्पित Centre विकसित किया जाएगा, जो बिहार की सभी धरोहरों के तकनीकी अध्ययन और संरक्षण पर काम करेगा।
MOU समारोह में राज्य पुरातत्व निदेशक कृष्ण कुमार (भाप्रसे), IIT पटना के निदेशक प्रो. टीएन सिंह, रजिस्ट्रार डॉ. अक्षर पटेल, बिहार विरासत विकास समिति के कार्यपालक निदेशक प्रो. अनिल कुमार, डॉ. सप्तऋषि चौधरी और तिष्य घोष सहित अन्य विशेषज्ञ
मौजूद रहे।



