
नवरात्र के पांचवें दिन माँ स्कंदमाता की महिमा, ग्रंथों में है विशेष वर्णन: पं. ऋषिनाथ झा
मधुबनी-15 अक्टूबर। शारदीय नवरात्र के पांचवें दिन माँ दुर्गा के पंचम स्वरूप माँ स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है। इस संबंध में पं. ऋषिनाथ झा ने बताया कि माँ स्कंदमाता के स्वरूप और महात्म्य का वर्णन कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
पं. झा ने बताया कि मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में देवी के स्कंदमाता स्वरूप का उल्लेख है। ‘सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥’
वहीं श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के पंचम स्कंध में बताया गया है कि माँ पार्वती ने देवताओं की प्रार्थना पर तारकासुर के वध के लिए स्कंद (कार्तिकेय) को जन्म दिया, इसलिए वे स्कंदमाता कहलाईं। स्कंद पुराण के कुमारिका खंड में भी माँ के इस स्वरूप को मोक्ष और संतान सुख प्रदान करने वाली बताया गया है।
उन्होंने कहा कि कालिका पुराण में माँ को पद्मासना देवी कहा गया है क्योंकि वे कमल पर विराजमान रहती हैं और उनकी चार भुजाओं में कमल सुशोभित है। गोद में बालक स्कंद होने से यह स्वरूप मातृत्व और वात्सल्य का प्रतीक है।
पं. झा के अनुसार पांचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा से साधक के विशुद्ध चक्र की शुद्धि होती है, बुध ग्रह के दोष शांत होते हैं और संतान संबंधी बाधाएं दूर होती हैं। माँ को केले का भोग और पीले पुष्प अर्पित करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।



