
मिथिला-मधुबनी उर्दू विश्वविद्यालय’ की स्थापना की मांग, अधिवक्ता डॉ. मो. महताब आलम ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को लिखा पत्र
मधुबनी- 01 नवंबर। बिहार में द्वितीय राजभाषा उर्दू के कारण कानूनन द्वितीय राजभाषा से जुड़ा विश्वविद्यालय खोलने की मांग तेज हो गई है। मधुबनी व्यवहार न्यायालय के अधिवक्ता एवं मौला एजुकेशनल एवं वेलफेयर ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी डॉ. मो. महताब आलम ने मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पत्र लिखकर शीघ्र निर्णय लेने का आग्रह किया है। डॉ. आलम ने अपने पत्र में लिखा है कि बिहार राजभाषा अधिनियम, 1950 एवं संशोधन अधिनियम, 1989 द्वारा उर्दू को बिहार की द्वितीय राजभाषा घोषित किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत राज्य को अपनी राजभाषा/द्वितीय राजभाषा के विकास,शिक्षण,प्रशिक्षण एवं रोजगार हेतु संस्थान व्यवस्था करना कानूनी दायित्व है।
उन्होंने बताया कि बिहार में 1989 से उर्दू द्वितीय राजभाषा है, पर आज तक एक भी स्वतंत्र उर्दू विश्वविद्यालय स्थापित नहीं है।जबकि तेलंगाना में मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली में उर्दू विश्वविद्यालय कार्यरत हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत राजभाषा विश्वविद्यालय स्थापित करना राज्य सरकार का अधिकार एवं दायित्व है। द्वितीय राजभाषा के कारण सरकारी स्कूल, मदरसे, अनुवादक पद, राजभाषा विभाग सृजित हैं, पर उच्च शिक्षा एवं शोध हेतु विश्वविद्यालय के अभाव में सभी उपेक्षा के शिकार हैं। लाखों उर्दूभाषी छात्र, शिक्षक, शायर, अदीब का भविष्य अवरुद्ध है, सरकार से 4 मांगें रखी है। जिसमें बिहार में शीघ्र ‘बिहार उर्दू विश्वविद्यालय’ अथवा ‘मिथिला-मधुबनी उर्दू विश्वविद्यालय’ की स्थापना की जाए, ताकि द्वितीय राजभाषा का कानूनी दर्जा सार्थक हो। उर्दू जो प्राथमिक से विश्वविद्यालय तक रोजगारपरक पाठ्यक्रम से जुड़ी है, नई जॉब ओरिएंटेड बहाली शीघ्र हो। उर्दू शोध, पत्रकारिता, अनुवाद एवं प्रतियोगी परीक्षा हेतु विशेष पीठ स्थापित की जाए। सभी विभागों में प्रखंड वार द्वितीय राजभाषा से जुड़ी लंबित नियुक्ति शीघ्र हो।
डॉ. आलम ने कहा कि यह कार्य सुशासन सरकार की न्याय के साथ विकास एवं समावेशी शिक्षा नीति का ऐतिहासिक प्रमाण होगा और बिहार के लाखों उर्दूभाषियों को उनका लंबित संवैधानिक हक प्राप्त होगा।



