
14 सितंबर को होगी विघ्नहर्ता की पूजा, गणेश चतुर्थी का व्रत और पूजन करने से दूर होती कष्ट, रोग और शत्रु बाधा : पं. शंभूनाथ झा
मधुबनी- 11 सितंबर। सनातन धर्म में प्रथम पूज्य और विघ्नहर्ता भगवान गणेश का जन्मोत्सव इस वर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर सोमवार, 14 सितंबर को मनाया जाएगा। विश्व प्रसिद्ध फेस रीडर व ज्योतिषाचार्य पंडित शंभूनाथ झा ने गणेश चतुर्थी के धार्मिक महत्व और पूजन विधि के बारे में विस्तार से बताया। पं. झा ने बताया कि किसी भी शुभ कार्य से पहले गणेश जी की पूजा करने से वह कार्य बिना विघ्न के सफल होता है। इन्हें बुद्धि, विवेक और सिद्धि के देवता माना जाता है।मान्यता है कि सच्चे मन से गणेश चतुर्थी का व्रत और पूजन करने से जीवन के सभी कष्ट, रोग, दरिद्रता और शत्रु बाधा दूर होती है।
गणेश जी को मोदक और दूर्वा अत्यंत प्रिय है। मोदक आनंद और ज्ञान का प्रतीक है। इस दिन गणेश जी को मोदक अर्पित करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है। पं. शंभूनाथ झा के अनुसार, भगवान गणेश को प्रथम पूज्य होने का वरदान कई पौराणिक कथाओं के कारण प्राप्त है। एक कथा के अनुसार एक बार देवताओं में सर्वप्रथम पूज्य कौन होगा, इसको लेकर विवाद हुआ। तब भगवान शिव ने कहा कि जो सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा सबसे पहले करेगा वही प्रथम पूज्य होगा। कार्तिकेय अपने वाहन मयूर पर पृथ्वी परिक्रमा के लिए निकल गए, जबकि गणेश जी ने अपने माता-पिता शिव-पार्वती की ही सात परिक्रमा कर ली और कहा कि माता-पिता में ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड है। उनकी इस बुद्धिमत्ता और भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें वरदान दिया कि आज से किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, पूजा से पहले तुम्हारी ही पूजा होगी।
गणेश जी का बड़ा सिर विशाल सोच, छोटी आंखें सूक्ष्म दृष्टि और बड़े कान अधिक सुनने और कम बोलने का प्रतीक है। इसलिए किसी भी कार्य को सिद्ध करने के लिए पहले बुद्धि और विवेक की आवश्यकता होती है। गणेश जी ही प्रदान करते हैं। पं. झा ने कहा कि इस दिन विधि-विधान से दूर्वा, सिंदूर और मोदक से पूजन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है।



