
06 नवंबर धनतेरस: क्षीर सागर मंथन से भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए- पं. शंभूनाथ झा ने बताया शास्त्रीय महत्व
मधुबनी- 01 नवंबर। इस वर्ष धनतेरस का पावन पर्व 6 नवंबर को मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्य पं. शंभूनाथ झा के अनुसार शास्त्रों में इस तिथि को धनत्रयोदशी, धन्वंतरि जयंती और यम त्रयोदशी तीनों कहा गया है। पं. झा बताते हैं कि भागवत पुराण, विष्णु पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को देवताओं और असुरों द्वारा किए गए क्षीर सागर मंथन से भगवान विष्णु के 12वें अंशावतार भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश, शंख, चक्र और औषधि लेकर प्रकट हुए।
वेदों में श्लोक है:
‘कार्तिके कृष्णपक्षे तु त्रयोदश्यां निशामुखे। यमदीपं बहिर्दद्यात् अपमृत्युर्विनश्यति।’
अर्थात इस दिन प्रदोष काल में दीपदान करने से अकाल मृत्यु टलती है और सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद के जनक और देवताओं के वैद्य हैं। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय उन्हीं की परंपरा है। इसी कारण भारत सरकार इस दिन को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाती है। पं. झा कहते हैं कि ‘धन्वंतरि’ शब्द का अर्थ ही है धन का अंत करने वाला रोग और धन की वृद्धि करने वाला स्वास्थ्य।
पं. शंभूनाथ झा कहते हैं कि ‘धनतेरस केवल सोना-चांदी खरीदने का दिन नहीं, यह स्वास्थ्य रूपी धन की पूजा का दिन है।’ शास्त्र वचन है कि ‘पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में माया।’ इस दिन सोना-चांदी, पीतल-तांबे के बर्तन खरीदना अमृत कलश का प्रतीक है। मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई चल-अचल संपत्ति में 13 गुना वृद्धि होती है।
एक कथा के अनुसार राजा हिम के 16 वर्षीय पुत्र को सर्पदंश से मृत्यु योग था। धनतेरस की रात उसकी नवविवाहित पत्नी ने द्वार पर दीपों की माला, सोने-चांदी के ढेर से यमराज का मार्ग रोक दिया और यमराज को पूरी रात जागकर रोका। प्रसन्न होकर यम ने उसके पति को दीर्घायु का वरदान दिया। इस रात दक्षिण दिशा में यम के नाम का चौमुखा दीपक जलाने से परिवार में अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।
पं. झा के अनुसार इस वर्ष शुभ मुहूर्त: प्रदोष काल पूजन: शाम 05:32 से 08:10 बजे तक। यमदीपदान: शाम 06:00 बजे, घर के बाहर दक्षिण मुख में। इस दिन धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, कुबेर और यमराज की एक साथ पूजा से धन, समृद्धि और दीर्घायु तीनों की प्राप्ति होती है। घर के मुख्य द्वार पर हल्दी-कुमकुम से स्वस्तिक बनाकर 13 दीपक जलाएं, यह 13 गुना फल देता है।



