
शारदीय नवरात्र: तीसरा दिन: माँ चंद्रघंटा : जिसके घंटे की ध्वनि से भागते हैं भय और नकारात्मक शक्तियाँ: पं. शंभूनाथ झा
मधुबनी- 13 अक्टूबर। शारदीय नवरात्र के तीसरे दिन आज दुर्गा मंदिरों और घरों में माँ दुर्गा के तीसरे स्वरूप माँ चंद्रघंटा की विधि-विधान से पूजा की गई। तीसरे दिन की पूजा आंतरिक भय, क्रोध और भ्रम पर विजय पाने का संदेश देती है। विश्व फेस रीडर व ज्योतिषाचार्य पं. शंभूनाथ झा बताते है माँ चंद्रघंटा की महिमा। उन्होंने बताया कि पुराणों में दो प्रमुख कथाएं मिलती हैं।
पहली कथा- महिषासुर वध से जुड़ी है। जब महिषासुर नामक दैत्य ने तीनों लोकों में आतंक फैलाकर देवराज इंद्र का सिंहासन छीनने का प्रयास किया, तो देवता त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास गए। त्रिदेवों को क्रोध आया और उनके मुख से तेज निकला। उसी तेज से माँ चंद्रघंटा का अवतरण हुआ। अवतरण के बाद भगवान शिव ने अपना त्रिशूल, विष्णु ने चक्र, इंद्र ने अपना घंटा और सूर्य देव ने अपना तेज उन्हें प्रदान किया। उसी घंटे से उनके मस्तक पर अर्धचंद्र का आकार बन गया और अंत में माँ ने महिषासुर का वध कर देवताओं को मुक्ति दिलाई।
दूसरी कथा- भगवान शिव के विवाह से जुड़ी है। जब भगवान शिव अपनी बारात लेकर राजा हिमवान के द्वार पर पहुंचे तो भूत-प्रेतों वाली बारात देखकर रानी मैना बेहोश हो गईं। तब अपनी माता के भय को दूर करने और लोक मर्यादा की रक्षा के लिए माता पार्वती ने अपने सुवर्ण आभा वाले, दस भुजाओं वाले और घंटे के आकार के अर्धचंद्र से सुशोभित स्वरूप धारण किया, जिसे माँ चंद्रघंटा कहा गया।
माँ के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, इसीलिए उनका नाम चंद्रघंटा पड़ा। घंटा की ध्वनि को दैवीय नाद माना जाता है, जो नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है।
सोने के समान चमकीला और तेजस्वी 10 भुजाएं- बाएं हाथों में त्रिशूल, गदा, तलवार, कमंडलु और वर मुद्रा, दाएं हाथों में कमल, तीर, धनुष,जप माला और अभय मुद्रा। बाहर से शांत,लेकिन युद्ध के लिए तत्पर। यह रूप शौर्य, साहस और दुष्ट शक्तियों से रक्षा का प्रतीक है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन साधक का मन मणिपुर चक्र में प्रवेश करता है। इस दिन घंटी की ध्वनि मन को एकाग्र करती है और इसे ऊर्जा जागरण का दिन कहा जाता है।
माँ चंद्रघंटा की पूजा में लाल वस्त्र, गेंदा के फूल और दूध से बनी खीर या खोये की मिठाई का भोग लगाने की परंपरा है।
इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ सौम्यता और विनम्रता बढ़ती है, मुख और काया में कांति आती है और स्वर में मधुरता आती है। भक्तों के जीवन से भय, संकट, मानसिक तनाव और बाधाएं दूर होती हैं। अलौकिक वस्तुओं के दर्शन और परमपद की प्राप्ति होती है। मंत्र: ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः` और प्रार्थना मंत्र पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यम् चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥



