
श्रीशैल पर्वत के शिखर के दर्शन मात्र से ही पुनर्जन्म के बंधन से मिल जाती है मुक्ति: मोद नारायण झा
नंद्याल/श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश), 04 अक्टूबर। आंध्र प्रदेश के नंद्याल जिले में श्रीशैलम, नल्लामल्ला पहाड़ियों पर कृष्णा नदी के किनारे स्थित मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र ऐसा धाम है, जहां ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों एक साथ विराजमान हैं।
मां रुकमिणी वृद्धाश्रम ट्रस्ट के अध्यक्ष मोद नारायण झा ने बताया कि पौराणिक कथा के अनुसार कार्तिकेय के नाराज होकर क्रौंच पर्वत पर चले जाने के बाद भगवान शिव और माता पार्वती उन्हें मनाने आए थे। उसी समय से भगवान शिव यहां मल्लिकार्जुन के रूप में विराजमान हो गए। ‘मल्लिका’ माता पार्वती का नाम है और ‘अर्जुन’ भगवान शिव का।
उन्होंने कहा कि शास्त्रों में उल्लेख है *”श्रीशैले शिखरं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते”* अर्थात श्रीशैल पर्वत के शिखर के दर्शन मात्र से ही पुनर्जन्म के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।
श्री झा ने बताया कि यहां दर्शन-पूजन करने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है। यह भगवान शिव का कैलाश के बाद सबसे पवित्र निवास माना जाता है। यहां स्वयं भगवान शिव और आदिशक्ति एक साथ विराजते हैं, इसलिए यह धाम मुक्ति और शक्ति दोनों प्रदान करने वाला है।
उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत में स्थित इस ज्योतिर्लिंग का शिवलिंग प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ स्वयंभू है। मंदिर परिसर में भ्रमराम्बा देवी का मंदिर भी स्थित है, जो 18 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से जल चढ़ाने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। सावन मास, महाशिवरात्रि और कार्तिक मास में यहां दर्शन करना विशेष फलदायी माना जाता है।



