
मिथिला में आस्था के साथ 14 सितंबर को मनाया जाएगा लोकपर्व चौठचंद्र, चंद्रमा को दिया जाएगा अर्घ्य
मधुबनी- 03 सितंबर। मिथिला में हर साल भाद्र शुक्ल चतुर्थी को मनाया जाने वाला लोकपर्व चौठचंद्र इस वर्ष 14 सितंबर को पूरे आस्था और विश्वास के साथ मनाया जाएगा। इसे चौरचन पर्व के नाम से भी जाना जाता है।
इस पर्व के धार्मिक महत्व की जानकारी देते हुए ज्योतिषाचार्या आभा झा ने बताया कि भादो माह की चौथ के चांद को देखना आम तौर पर अशुभ माना जाता है, लेकिन मिथिला में इसी चांद की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा और भगवान गणेश की संयुक्त पूजा करने से व्यक्ति को झूठे कलंक और दोष से मुक्ति मिलती है।
उन्होंने बताया कि पौराणिक कथा के अनुसार चंद्रमा ने भगवान गणेश के स्वरूप का उपहास किया था, जिससे क्रोधित होकर भगवान गणेश ने चंद्रमा को श्राप दिया था। बाद में चंद्रमा ने पश्चाताप करते हुए भाद्र शुक्ल चतुर्थी के दिन ही भगवान गणेश की पूजा-अर्चना कर श्राप से मुक्ति पाई थी। तभी से इस दिन चौठचंद्र पर्व मनाने की परंपरा चली आ रही है।
कहा जाता है कि 16वीं सदी में मिथिला नरेश हेमांगद ठाकुर की रानी हेमलता ने चांद को पूजने की इस परंपरा की शुरुआत की थी, जो धीरे-धीरे एक बड़े लोकपर्व के रूप में स्थापित हो गया। चौठचंद्र के दिन महिलाएं सुबह से ही व्रत रखती हैं। शाम के समय घर के आंगन को गोबर से लीपकर चावल के आटे से अरिपन बनाई जाती है। इसके बाद बांस की टोकरी और सूप में खीर, पूरी, पिरुकिया (गुझिया), खाजा, लड्डू, दही, केला, खीरा और अन्य मौसमी फलों को सजाकर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है। यह पर्व पूरे परिवार में उत्साह और खुशी का माहौल भर देता है।



