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हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने पर विशेष डाक टिकट जारी, बोले मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, कहा- पत्रकारिता पेशा नहीं, राष्ट्र चेतना का आंदोलन है

नई दिल्ली- 30 मई। केंद्रीय संचार एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शनिवार को विशेष डाक टिकट जारी किया। इस अवसर पर हिंदी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की यात्रा को समर्पित पुस्तक ‘हिंदी पत्रकारिता : 200 वर्षों की महागाथा’ का लोकार्पण भी किया गया। साथ ही वरिष्ठ लेखक श्रीकांत सिंह की पुस्तक और भारतीय जन संचार संस्थान के हिंदी पत्रकारिता द्विशताब्दी विशेषांक का भी विमोचन किया गया।

कार्यक्रम का आयोजन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और माधवराव सप्रे स्मृति समाचारपत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान द्वारा आईजीएनसीए के समवेत सभागार में किया गया। कार्यक्रम में भारतीय जन संचार संस्थान की कुलपति प्रज्ञा पालीवाल भी उपस्थित रहीं।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता का इतिहास देश के इतिहास की गाथा है। यह केवल किसी भाषा या माध्यम की यात्रा नहीं, बल्कि भारत की चेतना, विचार और राष्ट्रीय जागरण की यात्रा है। यह आयोजन कोई औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि देश की वैचारिक स्वतंत्रता का उत्सव है। उन्होंने कहा कि जब उनके समक्ष उदंत मार्तण्ड के द्विशताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में डाक टिकट जारी करने का प्रस्ताव आया तो उन्होंने इसे केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि राष्ट्र की वैचारिक परंपरा को नमन करने का अवसर माना।

सिंधिया ने कहा कि 30 मई 1826 को पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने उदंत मार्तण्ड का प्रकाशन आरंभ किया था। उस समय न विज्ञापन थे, न कोई व्यावसायिक मॉडल और न ही पर्याप्त संसाधन। इसके बावजूद देशभक्ति की भावना और जनजागरण के संकल्प ने एक ऐसे आंदोलन को जन्म दिया जिसने आगे चलकर हिंदी पत्रकारिता की मजबूत नींव रखी। पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्र चेतना का आंदोलन है।

उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौर में देश के अनेक सेनानियों ने पत्रकारिता को संघर्ष का माध्यम बनाया। उस समय कलम तलवार के समान प्रभावी हथियार बन गई थी। गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों ने अपने लेखन से स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा दी। उनके शब्द स्वतंत्रता के बिगुल के समान थे। उन्होंने पत्रकारिता को शहादत और राष्ट्रसेवा का स्वरूप प्रदान किया।

सिंधिया ने कहा कि वर्तमान समय में पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ा संकट विश्वास का है। फर्जी सूचनाओं और भ्रामक सामग्री ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को चुनौती दी है। पहले आंखों देखी बात को सत्य माना जाता था, लेकिन आज तकनीक के युग में आंखों से देखा गया वीडियो भी भ्रामक हो सकता है। ऐसे समय में पत्रकारिता को तकनीक का उपयोग करते हुए सत्य, संवेदनशीलता और विश्वसनीयता के मूल्यों को और अधिक मजबूत करना होगा।

उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता और डाक विभाग का संबंध ऐतिहासिक रहा है। एक समय देश के दूर-दराज क्षेत्रों तक समाचार और सूचनाएं पहुंचाने में डाक व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका थी। आज भी देश के लाखों गांवों में डाकिया विश्वास और भरोसे का प्रतीक माना जाता है। बदलते समय में तकनीक और मंच बदल सकते हैं, लेकिन पत्रकारिता का धर्म नहीं बदलना चाहिए। सत्य, संवेदनशीलता और विश्वसनीयता ही पत्रकारिता की वास्तविक पहचान है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संदेश का वाचन किया। संदेश में प्रधानमंत्री ने हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की गौरवशाली यात्रा को भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण अध्याय बताया। उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने समाज को दिशा देने, जनमत निर्माण करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त बनाने में ऐतिहासिक योगदान दिया है।

माधवराव सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता की पूरी यात्रा प्रतिरोध, संघर्ष और जनहित की यात्रा रही है। उदंत मार्तण्ड का प्रकाशन हिंदुस्तानियों के हित के लिए आरंभ किया गया था। यद्यपि पर्याप्त सहयोग न मिलने के कारण यह समाचारपत्र एक वर्ष सात महीने बाद बंद हो गया, लेकिन उसके द्वारा बोया गया विचार और चेतना का बीज निरंतर विकसित होता रहा। उन्होंने कहा कि आजादी के आंदोलन से लेकर वर्तमान समय तक हिंदी पत्रकारिता समाज और राष्ट्र जीवन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है।

कार्यक्रम में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी सहित अनेक वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, शिक्षाविद् और मीडिया जगत से जुड़े गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। आयोजन के अंतर्गत हिंदी पत्रकारिता की विरासत को दर्शाने वाली विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें पत्रकारिता के इतिहास, दुर्लभ दस्तावेजों और ऐतिहासिक प्रकाशनों को प्रदर्शित किया गया।

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