बिहार

BIHAR:- नालंदा में रंगोत्सव के मौके पर 5 गांवों में नहीं जलते हैं,चुल्हे

बिहारशरीफ- 19 मार्च। जिला मुख्यालय स्थित बिहारशरीफ से सटे पांच गांव ऐसे हैं जहा रंगोत्सव के दिन किसी भी घर में चूल्हा नहीं चलते हैं। शुद्ध शाकाहार रहते हैं। मांस-मदिरा के सेवन पर पूर्ण पाबंदी रहती है। बासी भोजन करते हैं। गांवों के लोग फगुआ के गीतों पर झूमते नहीं हैं। ईश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं। 50 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।होली के रंग में भंग न हो। शांति और भाईचारा आपस में बने रहे। इसके लिए पतुआना,बासवन बिगहा, ढीबरापर, नकटपुरा और डेढ़धारा में होलिकादहन की शाम से 24 घंटे का अखंड कीर्तन होता है।

धार्मिक अनुष्ठान की शुरुआत होने से पहले ही लोग घरों में मिठा भोजन तैयार कर रख लेते हैं। जबतक अखंड का समापन नहीं होता है, तबतक घरों में चूल्हे जलाने और धुआं करना वर्जित रहता है। लोग नमक का भी सेवन नहीं करते हैं। भले ही होली के दिन हर जगहों पर रंगों की बौछार होती है। लेकिन, इन पांच गांवों के लोग रंग-गुलाल उड़ाने की जगह हरे राम हरे कृष्ण की जाप करते हैं। हां इतना जरूर है कि बसिऔरा के दिन होली का आनंद जरूर उठाते हैं।इस मामले में पतुआना निवासी पूर्व वार्ड पार्षद जागेश्वर यादव, समाजसेवी नीतीश कुमार यादव, किसान सिंगेश्वर यादव, सिकंदर गोप, नवदीप प्रसाद कहते हैं कि पहले होली के मौके पर गांवों में अक्सर विवाद होते रहता था। लड़ाई-झगड़े के कारण पर्व की खुशियों में खलल पैदा होती रहती थी। इससे छुटकारा पाने के लिए सिद्ध पुरुष संत बाबा ने ग्रामीणों को ईश्वर भक्ति की सीख दी थी। तभी से होली के मौके पर अखंड कीर्तन की परंपरा शुरू हुई। इसका फलाफल यह कि शांति कायम रहता है।ग्रामीण बताते हैं कि संत बाबा शहर के इमादपुर के रहने वाले थे। गांव में अक्सर विवाद होते रहता था। इससे नाराज होकर कम उम्र में ही सांसारिक जीवन का मोह त्याग कर वे घर से निकल गये। सबसे पहले वे पतुआना के पास खंधे में रहने लगे। बाद में राजकुआं के खंधे में अपना निवास बनाया और तपस्या में लीन हो गये। उस वक्त यह स्थान निर्जन था। बाबा ने वहां पीपल और बर के पेड़ लगाये। कुआं भी बनवाया। धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि बढ़ने लगी और लोग उनके दरबार में आने लगे।

दो अक्टूबर 2000 की रात में बाबा ने शरीर त्यागा था। तीन अक्टूबर को आश्रम में ही उनकी समाधि बनायी जो फिलहाल भव्य मंदिर का रूप ले चुका है। समाधिक के बगल में ही संत बाबा की उजले संगमरमर की प्रतिमा स्थापित की गयी है। 24 घंटे में एक बार भोजन करते थे। पानी भी एक बार ही पीते थे। भोजन करते उन्हें किसी ने नहीं देखा। वे बहुत बड़े हठयोगी थे।संत आश्रम में एक कुआं है। इसका पानी अमृत के समान है। मान्यता है कि सांप काट लेने पर मरीज को कुएं का पानी पिलाया जाता है और स्नान भी कराया जाता है। इससे वह भला-चंगा हो जाता है। बिच्छु के काटने पर भी कुएं का पानी पिलाने पर पीड़ित व्यक्ति का कष्ट दूर हो जाता है। इतना ही नहीं कुएं के पानी का सेवन करने से कई गंभीर बीमारियों से भी मुक्ति मिलती है।

Join WhatsApp Channel Join Now
Subscribe and Follow on YouTube Subscribe
Follow on Facebook Follow
Follow on Instagram Follow
Follow on X-twitter Follow
Follow on Pinterest Follow
Download from Google Play Store Download

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button