
MADHUBANI:- धनतेरस पर गूंजे ‘जय धन्वंतरि’ के जयकारे, आरोग्य और समृद्धि की कामना के साथ हुई पूजा-अर्चना
मधुबनी, 06 नवंबर। धनतेरस के पावन अवसर पर शुक्रवार को जिले भर में आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि की पूजा-अर्चना धूमधाम से हुई। शहर के बाटा चौक स्थित श्रीकृष्ण औषधालय में भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की गई। दीप जलाए गए और धन-धान्य की समृद्धि की कामना की गई। श्रद्धालुओं ने भगवान धन्वंतरि से परिवार की सुख-शांति, स्वास्थ्य और समृद्धि की प्रार्थना की। इस अवसर पर संजीव मिश्रा ने कहा कि शास्त्रों में इस तिथि को धनत्रयोदशी, धन्वंतरि जयंती और यम त्रयोदशी तीनों कहा गया है।
भागवत पुराण, विष्णु पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को देवताओं और असुरों द्वारा किए गए क्षीर सागर मंथन से भगवान विष्णु के 12वें अंशावतार भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश, शंख, चक्र और औषधि लेकर प्रकट हुए।
वेदों में श्लोक है कि ‘कार्तिके कृष्णपक्षे तु त्रयोदश्यां निशामुखे। यमदीपं बहिर्दद्यात् अपमृत्युर्विनश्यति।’
अर्थात इस दिन प्रदोष काल में दीपदान करने से अकाल मृत्यु टलती है और सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं। शास्त्रों के अनुसार भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद के जनक और देवताओं के वैद्य हैं। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांग हृदय उन्हीं की परंपरा है। श्री मिश्रा ने कहा कि ‘धन्वंतरि’ शब्द का अर्थ ही है धन का अंत करने वाला रोग और धन की वृद्धि करने वाला स्वास्थ्य। धनतेरस केवल सोना-चांदी खरीदने का दिन नहीं, यह स्वास्थ्य रूपी धन की पूजा का दिन है।
शास्त्र वचन है कि ‘पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख घर में माया।’ इस दिन सोना-चांदी, पीतल-तांबे के बर्तन खरीदना अमृत कलश का प्रतीक है। एक कथा के अनुसार राजा हिम के 16 वर्षीय पुत्र को सर्पदंश से मृत्यु योग था। धनतेरस की रात उसकी नवविवाहित पत्नी ने द्वार पर दीपों की माला, सोने-चांदी के ढेर से यमराज का मार्ग रोक दिया और यमराज को पूरी रात जागकर रोका। प्रसन्न होकर यम ने उसके पति को दीर्घायु का वरदान दिया। इस रात दक्षिण दिशा में यम के नाम का चौमुखा दीपक जलाने से परिवार में अकाल मृत्यु का भय दूर होता है।



