
मिथिला का वृंदावन से पुराना नाता, राधा-कृष्ण के झूलनोत्सव की परंपरा: पं. ऋषिनाथ झा
मधुबनी- 25 अगस्त। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार सावन के महीने में श्रीकृष्ण अपनी प्रिय राधा रानी और गोपियों के साथ कदम के पेड़ पर पड़े झूले पर झूला करते थे। सावन की हरियाली, फूलों की खुशबू और झूले के आनंद को प्रेम और भक्ति का प्रतीक माना गया।धार्मिक ग्रंथों के अनुसार 16वीं शताब्दी में बंगाल के महान संत चैतन्य महाप्रभु जब वृंदावन आए, तो उन्होंने इस लीला को एक बड़े उत्सव का रूप दिया। उन्होंने गौड़ीय वैष्णव परंपरा में श्रावण शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक 5 दिनों तक भगवान को झूला झुलाने की परंपरा शुरू की। पं. ऋषिनाथ झा बताते हैं कि मिथिला का वृंदावन से पुराना नाता रहा है। मधुबनी, दरभंगा के कई पंडित और संत वृंदावन में शिक्षा ग्रहण करते थे। वहीं से इस परंपरा को मिथिला शुरुआत हुई।
मधुबनी जिले के कई ठाकुरबाड़ियों में 150 साल से भी ज्यादा समय से ये परंपरा बिना टूटे चली आ रही है। उन्होंने बताया कि सावन शुक्ल पक्ष में जब राधा-कृष्ण को झूला झुलाया जाता है, तो इससे दांपत्य जीवन में प्रेम बढ़ता है। संतान सुख की कामना पूरी होती है। इसीलिए पुत्रदा एकादशी के दिन से शुरू होने वाले इस उत्सव में विवाहित महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। राधा-कृष्ण को झूला झुलाकर अपने पति की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं।



