
सप्तम नवरात्रि पर माँ कालरात्रि की पूजा: नकारात्मक शक्तियों का नाश कर निर्भय बनाती हैं माता – पं. ऋषिनाथ झा
मधुबनी 17 अक्टूबर। शारदीय नवरात्रि के सप्तम दिन माँ दुर्गा के सातवें स्वरूप माँ कालरात्रि की पूजा-अर्चना की जाती है। माँ कालरात्रि अपने भक्तों को भय से मुक्ति और शत्रुओं पर विजय का आशीर्वाद देती हैं।
इस संबंध में मधुबनी के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं. ऋषिनाथ झा बताते हैं कि माँ कालरात्रि का स्वरूप देखने में भले ही अत्यंत भयानक है, लेकिन ये सदैव अपने भक्तों को शुभ फल देने वाली हैं। इसी कारण इनका एक नाम ‘शुभंकरी’ भी है।
उत्पत्ति की कथा:—
पं. झा के अनुसार, पौराणिक कथा के मुताबिक दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज के अत्याचार से देवता भयभीत हो गए थे। तब माँ पार्वती ने अपने तेज से कालरात्रि स्वरूप को उत्पन्न किया। माँ कालरात्रि ने अपने विकराल रूप में दुष्टों का संहार कर तीनों लोकों को भयमुक्त किया। इनका वाहन गर्दभ (गधा) है और ये अपने चार हाथों में खड्ग, त्रिशूल, अभय और वर मुद्रा धारण करती हैं।
सप्तम दिन की महिमा:
पं. झा ने बताया कि सप्तमी तिथि पर माँ कालरात्रि की उपासना से व्यक्ति के जीवन के सभी प्रकार के भय, भूत-प्रेत बाधा और ग्रह-दोष समाप्त हो जाते हैं। कालरात्रि की साधना से साधक को ब्रह्मांड की समस्त सिद्धियों का द्वार खुलने लगता है। माँ के स्मरण मात्र से ही बुरी शक्तियां भाग जाती हैं। सप्तमी के दिन गुड़ और रात में खिलने वाले फूलों से माता की पूजा करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती हैं।
उन्होंने कहा कि जो भक्त सच्चे मन से सप्तम दिन माँ कालरात्रि की पूजा करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता और उसके जीवन में तेज, निर्भयता और आत्मविश्वास का संचार होता है।



