
आयुर्वेद के पिता नहीं, प्राण हैं भगवान धन्वंतरि – 8 चिरंजीवियों में एक- संजीव मिश्रा
मधुबनी – 26 अक्टूबर। आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने का विज्ञान है। इस विज्ञान के मूल में हैं भगवान धन्वंतरि। आयुर्वेदिक ग्रंथों में उन्हें केवल देवता नहीं, बल्कि चिकित्सा का साक्षात स्वरूप बताया गया है। आयुर्वेद के जानकार श्रीकृष्ण औषधालय के संचालक संजीव मिश्रा ने बताया कि सुश्रुत संहिता के अनुसार भगवान धन्वंतरि ने ही वाराणसी के राजा दिवोदास के रूप में अवतार लेकर सुश्रुत सहित विश्व के पहले सर्जनों को शल्य चिकित्सा का ज्ञान दिया। सुश्रुत उन्हें “आद्य शल्य चिकित्सक” कहते हैं। उनके हाथ में शंख, चक्र, जोंक, औषधि और अमृत कलश आयुर्वेद के 5 सिद्धांतों के प्रतीक हैं – निदान, शोधन, शमन, रसायन और अमरत्व।
श्री मिश्रा ने बताया कि चरक ने धन्वंतरि को “आरोग्य का अधिपति” कहा है। वाग्भट्ट ने अष्टांग हृदयम में लिखा है कि “धन्वंतरि बिना आयुर्वेद अपूर्ण है, जैसे आत्मा बिना शरीर।”
धन्वंतरि ने आयुर्वेद को 8 अंगों में विभाजित किया – काय, बाल, ग्रह, शालाक्य, शल्य, दंष्ट्रा, जरा और वृष। जिसे अष्टांग आयुर्वेद कहा गया। यही आज का संपूर्ण मेडिकल साइंस है।
उन्होंने कहा कि शास्त्रों में 8 चिरंजीवियों में भगवान धन्वंतरि का नाम है – अश्वत्थामा, राजा बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम और धन्वंतरि। माना जाता है कि वे आज भी औषधियों में सूक्ष्म रूप में विद्यमान हैं। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धन्वंतरि जयंती ही धनतेरस है। इस दिन आयुर्वेदिक चिकित्सक अपने औजारों और ग्रंथों की पूजा करते हैं। तुलसी, नीम, आंवला और शंखपुष्पी को धन्वंतरि का प्रसाद माना जाता है।
संजीव मिश्रा का कहना है कि आधुनिक दौर में जब एलोपैथी दवाओं के साइड इफेक्ट बढ़ रहे हैं, तब धन्वंतरि द्वारा दिया गया “स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम्” का सिद्धांत – यानी स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग को दूर करना – आज दुनिया के लिए सबसे बड़ा संदेश है।



