
विजयादशमी पर ही क्यों होता है रावण वध? जानें महंत रत्नेश्वर दास से पौराणिक कथा और इसका महत्व
मधुबनी- 20 अक्टूबर। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को पूरे देश में विजयादशमी यानी दशहरा का पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम द्वारा लंकापति रावण का वध कर बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।
इस पावन पर्व की मान्यता और महत्व पर शहर के गंगासागर निधि चौक राम जानकी ठाकुरबाड़ी के महंत रत्नेश्वर दास ने विस्तृत जानकारी दी।
महंत ने बताया कि दशमी तिथि को विजय की तिथि कहा गया है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान राम ने नौ दिनों तक शक्ति की आराधना करने के बाद दशमी को रावण का वध किया था। इसलिए इसे विजयादशमी कहा जाता है। यह दिन सत्य की असत्य पर, धर्म की अधर्म पर विजय का प्रतीक है।
रावण वध से जुड़ी पौराणिक कथा–
महंत रत्नेश्वर दास के अनुसार, जब रावण ने माता सीता का हरण कर लिया था, तब भगवान राम ने रावण से युद्ध करने से पूर्व नौ दिनों तक मां दुर्गा की कठोर उपासना की थी और उनसे विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया था। मां के आशीर्वाद से ही दशमी के दिन राम ने रावण की नाभि में बाण मारकर उसका अंत किया। उन्होंने कहा कि एक अन्य कथा के अनुसार मां दुर्गा ने भी नौ दिनों तक महिषासुर से युद्ध किया था और दसवें दिन उसका वध किया था। इसलिए भी दशमी को शक्ति के विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
दशहरा का सामाजिक संदेश—
महंत ने कहा कि आज के समय में रावण वध का अर्थ केवल पुतला जलाना नहीं है। हमें अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी रावण का वध करना चाहिए। दशहरा हमें सिखाता है कि कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अहंकारी और अधर्मी व्यक्ति का अंत निश्चित है।
उन्होंने कहा कि इस दिन शस्त्र पूजन, नीलकंठ दर्शन और बड़ों से विजय का आशीर्वाद लेने की परंपरा भी है। इस दिन शुरू किया गया कोई भी शुभ कार्य सफल होता है।



