
मिथिला का कवच है झिझिया: बुरी नजर से बचाती हैं कन्याएं, नवरात्र में 10 दिन तक गूंजता है ‘तोहरे भरोसे ब्रह्म बाबा…’
मधुबनी- 14 अक्टूबर। शारदीय नवरात्र का ढोल बजते ही शहर से लेकर गांवों की गलियों में एक ही लय गूंजती है- ‘तोहरे भरोसे ब्रह्म बाबा झिझरी बनैलिये हो…’। सिर पर सैकड़ों छेद वाला मिट्टी का घड़ा, उसमें जलता दीया और गोल घेरे में नृत्य करती 5 से 15 कुमारी कन्याएं। इसे कहते हैं ‘झिझिया’। मिथिला का यह लोकनृत्य सिर्फ नृत्य नहीं, बल्कि कवच है डायन, भूत-प्रेत और समाज की कलुषित मानसिकता से बचने का।
झिझिया मिथिला और नेपाल का प्राचीन लोकनृत्य है, जो मां दुर्गा भैरवी को समर्पित है। मान्यता है कि इसकी शुरुआत 8वीं सदी में राजा जनक के समय हुई थी। दूसरी लोककथा राजा चित्रसेन और उनकी रानी से जुड़ी है, जहां काले जादू से बचाने के लिए कराया गया तांत्रिक अनुष्ठान ही आगे चलकर झिझिया बन गया।
घटस्थापना से विजयादशमी तक लगातार 10 रातें यह नृत्य चलता है। बीच में मुख्य नर्तकी ब्रह्म बाबा और मां भगवती से समाज में व्याप्त भगत, डायन, चुड़ैल को खत्म करने की प्रार्थना गीतों के माध्यम से करती है। पुरुष कलाकार हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा, खजुरी, बांसुरी और शहनाई बजाते हैं।
संघर्ष के बाद मिली पहचान—
अच्छी बात यह है कि झिझिया के प्रचार-प्रसार पर काम हुआ है। लोकरंग संस्था, चकदह द्वारा 1998 से हर साल लड़कियों को 3 से 6 महीने का निशुल्क प्रशिक्षण दिया जा रहा है। संस्था के अध्यक्ष जटाधर पासवान के मुताबिक उनकी टोलियां देशभर में प्रस्तुति देती हैं। 2023 में बिहार की 50 कलाकारों ने दिल्ली के राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड में झिझिया की प्रस्तुति देकर मिथिला का नाम रोशन किया था।
जागरण कला महाविद्यालय की प्राचार्य मंजरी मिश्रा बताती हैं कि प्रशिक्षण दिया जाता है, पर कम ही लड़कियां आती हैं। जिले में 100 से अधिक सक्रिय कलाकार हैं, जो सालाना 50 हजार तक कमा लेती हैं।
शहर का बॉलीवुड डांस स्कूल भी कई साल से झिझिया को आगे बढ़ाने में जुटा है। निदेशक विक्रांत ने बताया कि महिलाओं व बच्चियों को नि:शुल्क प्रशिक्षण देकर भगवती स्थान से बाबू साहेब परिसर तक जीवंत झिझिया की झांकी निकाली जाती है।



