
हावड़ा में हुनर के आगे छोटी पड़ती मजहब की दीवारें, हिंदू-मुस्लिम मिलकर बनाते हैं देवी प्रतिमाओं के केश
हावड़ा- 11 अक्टूबर। मजहब की दीवारें यहां हुनर और इंसानियत के आगे छोटी पड़ जाती हैं। दुर्गापूजा की आहट के साथ ही पूरे बंगाल में प्रतिमाओं और पंडालों को सजाने-संवारने का काम शुरू हो जाता है, वहीं हावड़ा के पार्वतीपुर गांव में हिंदू और मुस्लिम परिवार मिलकर मां दुर्गा समेत देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के लिए केश सज्जा तैयार करने में जुट जाते हैं।
आस्था हिंदुओं की, हुनर दोनों समुदायों का और मेहनत साझा। दशकों से चली आ रही यह परंपरा न केवल कुम्हारटोली से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों तक पार्वतीपुर की पहचान पहुंचा रही है, बल्कि सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी पेश कर रही है।
धर्म अलग, त्योहार सबके—
जगतबल्लभपुर ब्लॉक स्थित पार्वतीपुर में दुर्गापूजा नजदीक आते ही नकली बाल बनाने का काम तेज हो जाता है। घर-घर में दिन-रात कारीगर जुटे रहते हैं। हिंदू बस्तियों से लेकर मुस्लिम मोहल्लों तक पुरुष और महिलाएं एक-दूसरे के सहयोग से काम पूरा करते हैं।
यहां बने बाल कोलकाता के कुम्हारटोली के मूर्तिकारों तक पहुंचते हैं। बिहार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश समेत देश के विभिन्न हिस्सों से ऑर्डर आते हैं। बांग्लादेश और नेपाल तक इनका निर्यात होता है।
जूट के रेशों से तैयार होते हैं बाल—
कारीगरों के अनुसार, देवी पार्वती के लिए काले, भगवान शिव के लिए लाल और अन्य प्रतिमाओं के लिए नारंगी रंग के बाल तैयार किए जाते हैं। कुछ सीधे तो कुछ घुंघराले होते हैं।
इसके लिए हुगली जिले के माशाट और शियाखाला से कच्चा जूट लाया जाता है। रेशों को धोकर, उबालकर धूप में सुखाया जाता है, फिर रंग चढ़ाया जाता है। सूखने के बाद रेशों को काटकर कीलों से बनी विशेष कंघी से व्यवस्थित किया जाता है। घुंघराले बालों के लिए रेशों को जूट की पतली लकड़ियों पर लपेटा जाता है।
उपनिषदों का संदेश है- ‘अमृतस्य पुत्राः’, अर्थात सभी मनुष्य अमृत की संतान हैं। पार्वतीपुर के कारीगरों का साझा श्रम इसी भावना को साकार करता है।



