
सौराठ सभा की पंजी प्रथा की सिद्धांत से सुखमय होता वैवाहिक जीवन: ऋषिनाथ झा
मधुबनी- 28 अप्र्रैल। विवाह जैसे पवित्र बंधन को पवित्र और सुखमय बनाने के लिए सौराठ की पंजी व्यवस्था का पालन किया जाना अनिवार्य होगा। इससे वैवाहिक जीवन सुखमय होने के साथ-साथ बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। विवाह के लिए पूर्वजों के समय से ही सौराठ सभा के पंजीकार से मूल-गोत्र मिलान के बाद ही विवाह पूरा कराते रहे है। इस साल 2 से 12 जुलाई तक सौराठ सभावास का आयोजन किया जाएगा। उक्त जानकारी प्रसिद्ध पं. ऋषिनाथ झा ने दी।
उन्होंने बताया कि समगोत्र में विवाह से बचाव के लिए सौराठ सभा की पंजी व्यवस्था मिथिला का धरोहर है। वर पक्ष के मूल-गोत्र मिलान के बगैर पुत्री का विवाह सोच भी नहीं सकते है। उन्होंने कहा कि कंप्यूटर युग में सौराठ की पंजी व्यवस्था को बेहतर ढंग से लागू किया जा सकता है। मिथिला के इस पवित्र परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए युवाओं को आगे आना होगा। पंजी प्रथा का पालन करने से घर, समाज का कल्याण होता है। विश्व प्रसिद्ध सौराठ सभा की पंजी परंपरा का पालन और पंजी की रक्षा होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पूर्व में मिथिला क्षेत्र में पांच से सात गांवों पर पंजी प्रबंधन की व्यवस्था थी।कम्प्यूटर युग में पंजी प्रथा को विकसित कर आनलाइन सिद्धांत हो रहा है। दुनियाभर में पंजी प्रथा का प्रसार बढेगा। राज दरभंगा और सरकार के सहयोग से सौराठ सभा के विकास और पंजी व्यवस्था के लिए समाज के लोगों को आगे की जरूरत है। इसके लिए सामुहिक रुप से प्रयास किया जाना चाहिए। पंजी परंपरा को विकसित करने के लिए नए ढंग से पहल करना होगा। सौराठ सभावास पहुंचे वर-कन्या पक्ष के लोग वर-कन्या पहुंचकर विवाह के लिए सिद्धांत की प्रक्रिया अपनाते है।



