
MADHUBANI ‘कथा 89 की’ मृत जमीन विक्रेता दिलीप साह पर नहीं हो सकती FIR, केस डायरी में दर्ज होगी उनकी भूमिका
मधुबनी – 07 जुलाई। शहर के बहुचर्चित खेसरा 89 की जमीन विवाद और नगर थाना में दर्ज हालिया प्राथमिकी के बाद जिला विधिक और सामाजिक गलियारों में एक नई बहस छिड़ गई है। आम जनता के बीच यह सवाल तैर रहा है कि पुलिस ने जमीन खरीदने वालों पर तो शिकंजा कस दिया, लेकिन जिसने जमीन की बिक्री (केवाला) की, उस दिलीप साह को प्राथमिकी में नामजद क्यों नहीं किया गया? क्या मुख्य विक्रेता की मृत्यु हो जाने से पूरा आपराधिक मामला ही कमजोर हो जाएगा? इस बेहद संवेदनशील कानूनी गुत्थी को सुलझाते हुए मधुबनी सिविल कोर्ट के जाने-माने अधिवक्ता राकेश रंजन झा ने इस पूरे मामले का एक-एक बिंदुवार और गहरा विधिक विश्लेषण की जानकारी दी है। य। कानून के छात्रों से लेकर आम लोगों के लिए जानना बेहद जरूरी है।
अधिवक्ता राकेश रंजन झा ने स्पष्ट किया कि कानूनन: मौत के साथ ही दफन हो जाता है व्यक्तिगत आपराधिक दायित्व। इस प्राथमिकी में मृत विक्रेता दिलीप साह को आरोपी न बनाए जाने के पीछे पुलिस की लापरवाही नहीं, बल्कि देश का सुदृढ़ कानून है। विधिक प्रावधानों के अनुसार, किसी भी मृत व्यक्ति के खिलाफ कोई नई प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की जा सकती और न ही उसके खिलाफ कोई क्रिमिनल ट्रायल चलाया जा सकता है। आपराधिक कानून का यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि मृत्यु के साथ ही व्यक्ति की व्यक्तिगत आपराधिक जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है। यदि किसी जीवित व्यक्ति पर केस चल भी रहा हो और ट्रायल के दौरान उसकी मौत हो जाए, तो उसके खिलाफ चल रहा क्रिमिनल केस वहीं बंद कर दिया जाता है।
दिलीप साह भले ही मृत हैं, पर केस डायरी में दर्ज होगी भूमिका
अधिवक्ता ने महत्वपूर्ण बिंदु पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भले ही दिलीप साह को एफआईआर के आरोपी की सूची में नामजद नहीं किया जा सकता, लेकिन पुलिस अनुसंधान के दौरान उनकी भूमिका की जांच पूरी तरह होगी।अनुसंधानकर्ता (I.O.) केस डायरी में इस बात का पूरा ब्योरा दर्ज करेंगे कि किस प्रकार दिलीप साह ने जमीन की बिक्री की और साक्ष्य के रूप में उनका आधिकारिक मृत्यु प्रमाण-पत्र केस डायरी का हिस्सा बनाया जाएगा।
फंसे हुए खरीदारों के पास अब क्या है कानूनी रास्ता
अधिवक्ता ने बताया कि आपराधिक मामलों (जैसे चोरी, धोखाधड़ी) में भले ही वारिसों को जेल नहीं भेजा जा सकता, लेकिन दीवानी मामलों (Civil Cases) में स्थिति अलग है। यदि खरीदारों को धोखे में रखकर जमीन बेची गई थी, तो वे पीड़ित क्रेता के रूप में मृत दिलीप साह के कानूनी वारिसों (Legal Heirs/बेटे-पत्नी) को सिविल कोर्ट में पक्षकार बना सकते हैं। खरीदार कोर्ट के माध्यम से दिलीप साह के वारिसों से अपनी पूरी प्रतिफल राशि और हर्जाने की वसूली का मुकदमा दायर कर सकते हैं, जिसके लिए मृतक की बची हुई संपत्ति को उत्तरदायी ठहराया जाएगा। अधिवक्ता राकेश रंजन झा के विस्तृत विश्लेषण से साफ है कि खेसरा 89 का मामला जितना सीधा दिख रहा है, कानूनी रूप से उतना ही पेचीदा है। अगर जमीन सरकारी है तो इसमें जमीन के खरीददारों के साथ धोखाधड़ी और छल किया गया है। विक्रेता की मौत से भले ही एक क्रिमिनल चैप्टर बंद हो गया हो, लेकिन गवाहों की भूमिका और वारिसों की दीवानी देनदारी (Civil Liability) का कानूनी शिकंजा अभी भी पूरी तरह कसा हुआ है।



