बिहार

MADHUBANI:- फुलहर से प्राप्त अभिलेखयुक्त बौद्ध देवी तारा’ ’की प्रतिमा मिथिला’ ’ललित संग्रहालय’ ’को सुपुर्द’

मधुबनी, 01 जून। जिले के ऐतिहासिक,धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण फुलहर ग्राम स्थित बागतड़ाग पोखर की उड़ाही के दौरान प्राप्त मिथिलाक्षर अभिलेखयुक्त खण्डित बौद्ध देवी तारा की प्रतिमा तथा कैथी लिपि में अभिलेख उत्कीर्ण एक धातु निर्मित पुरावशेष को शोध, संरक्षण एवं सुरक्षण के उद्देश्य से सौराठ स्थित मिथिला ललित संग्रहालय को विधिवत् सुपुर्द कर दिया गया।

प्रतिमा एवं पुरावशेष के प्राप्त होने की सूचना पर जिला प्रशासन ने तत्काल संज्ञान लेते हुए इसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं पुरातात्त्विक महत्व को देखते हुए सुरक्षित संरक्षण की पहल की। इसी क्रम में श्री सीताराम जी भगवान समिति के सदस्यों ने प्रखंड विकास पदाधिकारी, हरलाखी तथा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग के शोधार्थी मुरारी कुमार झा की उपस्थिति में उक्त प्रतिमा एवं पुरावशेष को जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी, मधुबनी सह संग्रहालयाध्यक्ष को सौंपा। फुलहर क्षेत्र में प्राचीन बसावट एवं धार्मिक केंद्र होने के मिले संकेत स्थल निरीक्षण के उपरांत पुरातत्त्व विषय के शोधार्थी मुरारी कुमार झा ने बताया कि बागतड़ाग पोखर के पश्चिमी हिस्से से प्राप्त यह खण्डित अभिलेखयुक्त बौद्ध देवी तारा की प्रतिमा अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि क्षेत्र से भविष्य में और भी प्रतिमाएं तथा अन्य पुरावशेष प्राप्त होने की संभावना है, क्योंकि पोखर के दक्षिण-पश्चिमी भिंडे पर विभिन्न प्रकार के मृद्भाण्डावशेष बिखरे हुए पाए गए हैं, जो प्राचीन मानव बसावट के स्पष्ट संकेत हैं। उन्होंने बताया कि उपलब्ध पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर अनुमान लगाया जा सकता है कि 11वीं-12वीं शताब्दी के दौरान यहां एक विकसित ग्राम अथवा धार्मिक केंद्र अस्तित्व में रहा होगा। निरीक्षण के दौरान दो स्थानों पर जली हुई मिट्टी भी पाई गई, जो संभवतः प्राचीन चूल्हों अथवा यज्ञ वेदियों के अवशेष हो सकते हैं। उन्होंने क्षेत्र में अत्यंत सावधानीपूर्वक उत्खनन एवं मिट्टी कटाई की आवश्यकता पर बल दिया। मुरारी कुमार झा ने स्थानीय ग्रामीणों एवं समिति सदस्यों की सराहना करते हुए कहा कि प्रतिमा को संग्रहालय को सौंपना क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के प्रति उनकी जागरूकता और प्रतिबद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह कदम न केवल विरासत संरक्षण को सुदृढ़ करेगा बल्कि भावी शोधार्थियों एवं इतिहास-अध्येताओं को महत्वपूर्ण अध्ययन सामग्री भी उपलब्ध कराएगा।

जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी, मधुबनी सह संग्रहालयाध्यक्ष ने कहा कि फुलहर गांव के लोगों द्वारा प्रतिमा को संग्रहालय को सौंपना अत्यंत अनुकरणीय एवं प्रशंसनीय कार्य है। उन्होंने बताया कि संग्रहालय को प्राप्त प्रतिमा बौद्ध धर्म की प्रमुख देवी तारा से संबंधित है तथा इस पर मिथिलाक्षर लिपि में बौद्ध मंत्र उत्कीर्ण है, जिससे इसका ऐतिहासिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि प्रतिमा को संग्रहालय में सुरक्षित रखते हुए इसके अभिलेख, कला-शैली, काल-निर्धारण तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का विस्तृत अध्ययन कराया जाएगा। इससे मिथिला क्षेत्र में बौद्ध धर्म,तांत्रिक परंपराओं तथा मध्यकालीन सांस्कृतिक इतिहास से संबंधित अनेक नए तथ्यों के प्रकाश में आने की संभावना है।

मिथिला के कला एवं बौद्ध इतिहास में जुड़ा नया अध्याय इंटैक, बिहार के सह-संयोजक डॉ. शिव कुमार मिश्र ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि प्रतिमा का संग्रहालय में पहुंचना मिथिला की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि इस खोज से मिथिला के कला एवं सांस्कृतिक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा है तथा यह प्रमाणित होता है कि मिथिला क्षेत्र में बौद्ध धर्म एवं उससे जुड़ी सांस्कृतिक परंपराओं का प्रभाव रहा है। डॉ. मिश्र ने बताया कि प्रतिमा पर मिथिलाक्षर लिपि में प्रसिद्ध बौद्ध मंत्रकृ “ये धर्मा हेतुप्रभवा हेतुं तेषाम्तथाग(तो) ह्यवदत। तेषाञ्च यो निरोध एवम्वादी महाश्रमणः॥” उत्कीर्ण है, जो इसे अत्यंत दुर्लभ एवं शोध की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है। स्थानीय लोगों ने जताई खुशी, धरोहर संरक्षण के प्रति दिखाई जिम्मेदारी इस अवसर पर श्री सीताराम जी भगवान समिति के अध्यक्ष झगड़ू यादव, सचिव जितेन्द्र कुमार साह, पुजारी बिहारी लाल पाण्डेय,अमरेश कुमार यादव, कुम्भकरण यादव, बगरू कामत सहित अन्य स्थानीय लोगों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि फुलहर की ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित संरक्षण मिलना पूरे क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है। स्थानीय नागरिकों ने आशा व्यक्त की कि इस महत्वपूर्ण खोज से फुलहर एवं आसपास के क्षेत्रों में पुरातात्त्विक अनुसंधान को नई दिशा मिलेगी तथा मिथिला की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान प्राप्त होगी।

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