
जब दफ्तर ‘दरबार’ बन जाए: अलका मिश्रा ‘मिंकी’ ने ‘कॉरपोरेट दरबार’ में लिखी कॉरपोरेट की अनकही कहानी
पटना- 11 सितंबर। कॉरपोरेट की दुनिया बाहर से जितनी चमकदार दिखती है, अंदर से उतनी ही उलझी हुई है। इसी उलझन और अनकहे सच को शब्द दिए हैं लेखिका अलका मिश्रा ‘मिंकी’ ने अपनी नई पुस्तक ‘कॉरपोरेट दरबार’ में। लेखिका के मुताबिक ‘कॉरपोरेट दरबार’ सिर्फ एक किताब नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जहां कुर्सियां बदलती हैं, लेकिन सत्ता का खेल अक्सर वही रहता है।
किताब का नाम ही अपने आप में एक व्यंग्य है। लेखिका पूछती हैं दौर बदल गया, दफ्तरों का स्वरूप बदल गया, तकनीक बदल गई, लेकिन क्या सत्ता की मानसिकता भी पूरी तरह बदली है?
पुस्तक बताती है कि कॉरपोरेट में पद और अधिकार के साथ-साथ अनौपचारिक समीकरण भी चलते हैं।कौन निर्णय लेने वाले व्यक्ति के करीब है। किसकी बात बैठक में तुरंत सुनी जाती है? किसकी गलती नजरअंदाज होती है और किसकी छोटी चूक भी बड़ी बना दी जाती है? यही वह असहज सच्चाई है जिसे हर प्रोफेशनल महसूस करता है, पर कहता नहीं।
‘सफलता’ के पीछे इंसान की कहानी
‘कॉरपोरेट दरबार’ का सबसे दिलचस्प पक्ष यह है कि यह सिर्फ बॉस, कर्मचारी या प्रमोशन की कहानी नहीं है। यह उस इंसान की कहानी है जो हर दिन अपने काम के साथ-साथ अपने अस्तित्व को भी साबित करने की कोशिश करता है। वह कब चुप रहे, कब बोले, कहां समझौता करे और कहां सिद्धांतों पर खड़ा रहे।
अलका मिश्रा ‘मिंकी’ कहती हैं कि हर चमकती कुर्सी के पीछे एक कहानी होती है और हर दरबार में कुछ अनकही आवाजें होती हैं। ‘कॉरपोरेट दरबार’ उन्हीं आवाजों को सुनने और शब्द देने की मेरी कोशिश है। उनका सबसे बड़ा सवाल है कि अगर किसी व्यवस्था में आगे बढ़ने के लिए प्रतिभा के साथ सत्ता के समीकरण समझना भी जरूरी हो जाए, तो क्या हम उसे पूरी तरह मेरिट आधारित व्यवस्था कह सकते हैं?
किताब आईना है या सवाल?
लेखिका का लेखन रेडीमेड जवाब नहीं देता, बल्कि सोचने पर मजबूर करता है। क्या हम व्यवस्था को बदलते हैं या धीरे-धीरे उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं? क्या आधुनिक ऑफिस सचमुच पुराने दरबारों से अलग हैं, या सिर्फ दरबार की भाषा और पोशाक बदल गई है? इसी बहस को शुरू करती है ‘कॉरपोरेट दरबार’।



