
आस्था का सावन : देवों के देव भगवान शिव इस ब्रह्मांड के आदि, मध्य और अंत: पं. ऋषिनाथ झा
मधुबनी- 11 अगस्त। भगवान शिव की महिमा अपरंपार है। भगवान शिव इस ब्रह्मांड के आदि, मध्य और अंत हैं। उन्हें महाकाल, भोलेनाथ और देवों के देव महादेव कहा जाता है। भगवान शिव सिर्फ जलाभिषेक से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिव को संसार का पहला गुरु और योग का आरंभकर्ता माना जाता है।
सावन की महत्व पर चर्चा करते हुए पं. ऋषिनाथ झा ने कहा कि महाकाल शिव समय और मृत्यु के चक्र से पूरी तरह मुक्त हैं। विषपान कर संसार की रक्षा करने वाले नीलकंठ महादेव अपने भक्तों के हर कष्ट को दूर करते हैं। शिव की शरण में जाने वाले प्राणी का कल्याण होता है। सावन मास में सोमवार के दिन शिवलिंग पर गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा और चंदन अर्पित करने का विशेष विधान है।
उन्होंने कहा कि सावन का महीना में धरती को हरा भरा होना समृद्धि का प्रतीक है। धर्म ग्रंथों में इस मौसम को शिव भक्ति से जोड़ा गया है। भगवान शिव ही इस पूरे ब्रह्मांड के नित्य अधिष्ठाता हैं। भगवान शिव की आज्ञा के बिना इस पूरे ब्रह्माड में कोई भी किसी भी बंधन से मुक्त नहीं हो सकता हैं। भगवान शिव ने दुनिया को सहज सरल जीवन का उदाहरण दिया है। शिव औघड़दानी है, शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि शिव पुराण में देव महादेव ने अनेक अवतारों का वर्णन किया है। शिवपुराण के अनुसार, भगवान शिव ने 19 अवतार लिए थे। धरती पर बुराई का नाश करने के लिए भगवान ने समय-समय पर अवतार लिए है। भगवान विष्णु और भगवान शिव ने भी कई अवतार लिए हैं।.श्रृष्टि के आरंभ में जब कुछ नहीं था। तब प्रथम देव शिव ने ही श्रृष्टि की रचना के लिए पंच मुख धारण किए। शिव के पांच मुख से ही पांच तत्वों जल, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। जगत के कल्याण की कामना से भगवान सदाशिव के विभिन्न कल्पों में अनेक अवतार हुए।
रिपोर्ट कपिलेश्वर साह



