
आस्था का सावन: चंद्रमा ने भगवान शिव की पूजा-अर्चना कर फिर से पाया अपना सौंदर्य : मोद नारायण झा
मधुबनी- 04 अगस्त। भगवान शिव की महिमा अपरंपार और अनंत है। शिव इस सृष्टि के आदि, मध्य और अंत हैं। केवल एक लोटा जल और सच्चे मन से अर्पित करने मात्र से ही अपने भक्तों पर प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शिव को ‘भोलेनाथ’ भी कहा जाता है। भोलेनाथ कठिन तपस्या के बिना भी केवल भाव और भक्ति से मान जाते हैं।
सावन की महत्ता पर चर्चा करते हुए मोद नारायण झा ने बताया कि भगवान शिव को सोमेश्वर भी कहा जाता है। इसका अर्थ पहला सोम यानी चंद्रमा है। चन्द्रमा भी भगवान शिव के जटा को धारण किया हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार चंद्रमा ने भगवान शिव की पूजा-अर्चना की, जिससे वह निरोगी हो कर फिर से अपने सौंदर्य को पाया था। इसके बाद भगवान शिव ने दूज यानी द्वितीया तिथि को चंद्रमा को अपनी जटाओं में धारण किया। पुरातन काल से सोमवार को भगवान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन चंद्रदेव की पूजा अर्चना से मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। इससे कुंडली में चंद्रमा की स्थिति मजबूत होती है।
चंद्रमा को मन का स्वामी माना जाता है। इस महीने में साधना से साधक अपने अंदर दिव्य शक्तियों का जागृत कर सकता है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव प्रलय के देवता हैं। उनका हर संहार एक नई और सुंदर शुरुआत के लिए होता है। समुद्र मंथन के दौरान संसार की रक्षा के लिए भगवान शिव स्वयं हलाहल विष पिया और नीलकंठ कहलाए। भगवान शिव विवेक, ज्ञान और अहंकार के विनाश का प्रतीक है। भगवान शिव गले में सर्प भय पर विजय और नियंत्रण का संदेश देता है। त्रिशूल तीनों गुणों (सत, रज, तम) और कालों (भूत, भविष्य, वर्तमान) का संतुलन है।



