
कौन हैं घोड़े पर सवार भगवान रेवंत, जिनके बिना अधूरी है मिथिला की दुर्गा पूजा? बता रहीं हैं ज्योतिषी अनू झा
मधुबनी- 11 अक्टूबर। शारदीय नवरात्र प्रारंभ के साथ कलश स्थापना के दिन से ही पूजा स्थलों पर मां दुर्गा की पूजा शुरू हो जाती है। इसी दिन से घोड़े पर सवार भगवान रेवंत की प्रतिमा के दर्शन होने लगते हैं और उनकी पूजा प्रारंभ हो जाती है। मिथिला सहित बिहार-बंगाल में दुर्गा पूजा के दौरान भगवान रेवंत की प्रतिमा स्थापना अनिवार्य मानी जाती है।
कौन हैं भगवान रेवंत?
बताते हैं ज्योतिषी व वरिष्ठ सलाहकार, ज्योतिष गुरुजी डॉट कॉम के अनू झा धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान रेवंत भगवान सूर्य और उनकी पत्नी संज्ञा (सरण्यू) के सबसे छोटे पुत्र हैं। शनि, यमराज, अश्विनीकुमार और श्राद्धदेव मनु इनके बड़े भाई हैं। ऋग्वेद में इन्हें सूर्यपुत्र कहा गया है। पुराणों के अनुसार ये गुह्यकों के अधिपति हैं, जो हिमालय में वनवासी के रूप में रहते हैं। इनका वाहन घोड़ा और अस्त्र तलवार है। प्रतिमा में इन्हें घोड़े पर सवार शिकारी के रूप में धनुष-बाण धारण किए हुए दिखाया जाता है।
पूजा क्यों होती है?
मान्यता है कि भगवान रेवंत घोड़ों के अधिपति देवता हैं। यज्ञ-पूजा की रक्षा करते हैं। राजा भोज के ग्रंथ युक्तिकल्पतरु और नकुल द्वारा रचित अश्वशास्त्र में अश्वों की रक्षा और चिकित्सा के लिए रेवंत की पूजा का विधान है। दुर्गा पूजा के संदर्भ में कथा है कि जब देवी दुर्गा महिषासुर से युद्ध करने जा रही थीं, तो विघ्नों से पूजा स्थल की रक्षा के लिए भगवान रेवंत उनके आगे घोड़े पर सवार होकर चले। इसीलिए इन्हें दुर्गा पूजा का रक्षक और क्षेत्रपाल भी कहा जाता है। पुरातात्विक प्रमाणों के अनुसार बिहार-बंगाल में 6वीं शताब्दी से ही रेवंत पूजा का प्रचलन रहा है। सारनाथ से इनकी 7वीं शताब्दी की मूर्ति भी प्राप्त हुई है।



