
मिथिला में दस दिवसीय इंद्र पूजा शुरू, पं. शंभूनाथ झा से जानें- किस ग्रंथ में है उल्लेख और क्यों होती है पूजा
मधुबनी- 22 सितंबर। मधुबनी सहित पूरे मिथिला में कल 23 सितंबर से दस दिवसीय इंद्र पूजा महोत्सव की शुरुआत हो रही है। देवराज इंद्र की पूजा की महत्व पर चर्चा करते हुए विश्व प्रसिद्ध फेस रीडर व ज्योतिषाचार्य पं. शंभूनाथ झा कहते है कि कृषि प्रधान मिथिला में इसे इंद्रध्वज महोत्सव के रूप में मनाया जाता है।
देवराज इंद्र की पूजा का आधार केवल लोक-मान्यता नहीं, बल्कि वैदिक ग्रंथ हैं। इंद्र पूजा का सबसे प्राचीन उल्लेख ऋग्वेद में है। ऋग्वेद के लगभग एक चौथाई (250) सूक्त इंद्र को ही समर्पित हैं। उन्हें पुरंदर और वर्षा का देवता` कहा गया है। पं. झा ने कहा कि श्रीमद्भागवत महापुराण (10वां स्कंध, अध्याय-24) में इंद्र पूजा का सबसे विस्तृत वर्णन है। वृंदावन में नंद बाबा कहते हैं कि देवराज इंद्र मेघों के स्वामी हैं, उनकी कृपा से वर्षा होती है। अन्न पैदा होता है, इसलिए हम इंद्र यज्ञ करते हैं। भविष्य पुराण के इंद्रध्वज महोत्सव खंड और महाभारत के अनुशासन पर्व में 10 दिन तक इंद्र की ध्वजा स्थापित कर पूजा करने का स्पष्ट विधान बताया गया है। इसे ही `इन्द्रोत्सव`कहा गया है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार देवराज इंद्र वर्षा, मेघ और आंधी-तूफान के नियंत्रक हैं। मिथिला धान प्रधान क्षेत्र है। अच्छी वर्षा, अतिवृष्टि और सूखा से फसल की रक्षा तथा समृद्धि के लिए प्राचीन काल में राजा-महाराजा इंद्रध्वज की स्थापना करवाते थे। मिथिला की परंपरा में किसान आज भी इंद्र को वर्षा के देवता के रूप में पूजते हैं, ताकि खेत-खलिहान हरे-भरे रहें।



