
किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय लिखित में बतानी होगी वजह, ऐसा न करने पर गिरफ्तारी गैरकानूनी: सुप्रीम कोर्ट
उच्चतम न्यायालय ने कहा- गिरफ्तारी रद्द होने के बाद दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की मंजूरी जरूरी
नई दिल्ली- 21 सितंबर। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी की वजह लिखित में बताना जरूरी है। ऐसा नहीं करने पर गिरफ्तारी गैरकानूनी मानी जाएगी। जस्टिस उज्जवल भुईयां की अध्यक्षता वाली बेंच ने शिरोमणि अकाली दल के नेता जसकरण सिंह देओल की गिरफ्तारी के मामले की सुनवाई के दौरान ये बातें कहीं।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर ऐसी गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को रिहा कर दिया जाता है और जांच एजेंसी उसे दोबारा गिरफ्तार करना चाहती है, तो पुलिस सीधे उसे नहीं पकड़ सकती। इसके लिए पहले मजिस्ट्रेट से जरूरी अनुमति लेनी होगी। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को दोबारा गिरफ्तार करते समय भी गिरफ्तारी की वजह बताना जरूरी है। इसके साथ ही उसे यह भी बताना पड़ेगा कि पहली बार जब उसे गिरफ्तार किया गया तो उसकी वजह उसे क्यों नहीं बताई गई।
कोर्ट ने कहा कि पहली बार जिस पुलिस अधिकारी ने गिरफ्तारी की वजह बताए बिना किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया है तो वो संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि एक बार अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन होने पर वही पुलिस अधिकारी दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकता। दोबारा गिरफ्तारी के लिए पहली बार गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी के उपर के रैंक का पुलिस अधिकारी ही गिरफ्तार कर सकेगा।
मामला शिरोमणि अकाली दल के नेता जसकरण सिंह देओल की गिरफ्तारी का है। देओल पर एक नाबालिग के यौन शोषण का आरोप है। देओल को लुधियाना में 17 मई को गिरफ्तार किया गया था। देओल को गिरफ्तारी के 24 घंटे बाद अगले दिन मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश किया गया। मजिस्ट्रेट से देओल ने कहा कि उसे गिरफ्तारी की वजह नहीं बताई गई। उसके बाद मजिस्ट्रेट ने देओल को रिहा करने का आदेश ये कहते हुए दिया कि गिरफ्तार करते समय अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन किया गया।
मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ पंजाब पुलिस पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय पहुंची जहां उच्च न्यायालय ने देओल को दोबारा गिरफ्तार करने की मांग को खारिज कर दिया। उच्च न्यायालय ने जांच अधिकारी के खिलाफ इस बात के लिए कार्रवाई की बात कही कि देओल को गिरफ्तार करने के 24 घंटे से ज्यादा समय बीतने के बाद मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश किया गया। उच्च न्यायालय के इस आदेश के खिलाफ पंजाब पुलिस ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।



