
स्मार्टफोन बच्चों को बना रहा वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार
पटना- 04 मई। स्मार्टफोन बच्चों को वर्चुअल ऑटिज्म का शिकार बना रहा बच्चे के माता-पिता को लगता है कि हमारा बच्चा स्मार्टफोन से खेलता है। तथा बिना बताए यूट्यूब खोल लेता है गेम खेलता है, दिमाग से बहुत तेज हो गया है। परंतु यह बहुत ही खतरनाक है, कम उम्र के बच्चे जिनका स्पीच लैंग्वेज अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ, वह अगर एक सीमित समय से ज्यादा स्मार्ट फोन स्क्रीन या टैब स्क्रीन में रहता हो देखता हो तो कुछ समय बाद उसके व्यवहार उसका स्पीच प्रभावित हो जाता है। तथा उसमें ऑटिस्टिक बच्चों जैसा लक्षण दिखने लगता है,जिसे वर्चुअल ऑटिज्म भी कहा जाता है और फिर बच्चे को लंबे समय के लिए थेरेपी और इलाज की जरूरत पड़ जाती है।

लंबे समय स्मार्टफोन देखने पर बच्चों के व्यवहार कुशलता प्रभावित हो जाती है वह चिड़चिड़ा,हायपर,जिद्दी बन जाता है। बाहरी दुनिया से लगाओ कम कर लेता है बिना मोबाइल टीवी का खाना नहीं खा पाता है बच्चे जो समाज से सामाजिकता सीखते हैं वह नहीं सीख पाते और अन्य बच्चों के साथ खेलना दौड़ना स्कूल में एक जगह बैठना बंद कर देते हैं,अगर आप अपने बच्चे को स्मार्टफोन दे रहे हैं, तो सावधान हो जाइए स्पेशल बच्चे के ट्रीटमेंट और ट्रेंनिग के क्षेत्र में विगत 5 सालों से काम करने वाली संस्था जागृति (ए मल्टी रिहैबिलिटेशन सेंटर)में स्क्रीन एडिक्टेड चाइल्ड पहली बार आया तब से ही यह संस्था अभिभावकों में जागरूक जागरूकता फैला रही है। मोबाइल से निकलने वाली रेडियो तरंगे ना केवल दिमाग पर गहरा प्रभाव डालती है बल्कि इसमें सुनने की क्षमता भी कम हो जाती,आंखों की रोशनी प्रभावित होती है, इससे ADHD मानसिक विकारों का खतरा भी कई गुना बढ़ जाती है अगर आपके बच्चे में स्मार्टफोन के वजह से व्यावहारिक बदलाव हो गया या बोलना कम कर दिया या बंद कर दिया, तो बिना देर किए न्यूरोलॉजी,चाइल्ड स्पेशलिस्ट चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट स्पीच थैरेपिस्ट या रिहैबिलिटेशन के क्षेत्र में काम करने वाली किसी भी संस्था से तुरन्त संपर्क कर बच्चे का ट्रीटमेंट शुरू करवाएं बच्चे को कम से कम समय के लिए स्मार्टफोन दें उसमें भी साउंड का वैकल्पिक व्यवस्था रखें बच्चों को आउटर गेम में इंवॉल्ब करे, प्रकृति की सुंदरता दिखाएं, पार्क में लेकर जाएं अन्य बच्चों के साथ खेलने दें समय-समय पर थेरेपिस्ट से सलाह लें और ट्रेनिंग करवाएं।



