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सुप्रीम कोर्ट का राज्यों को निर्देश-सेक्स वर्कर्स को राशन से वंचित न करें

नई दिल्ली- 28 फरवरी। सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना महामारी के दौरान सेक्स वर्करों को राशन मुहैया कराने की मांग पर सुनवाई करते हुए सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि सेक्स वर्कर्स की पहचान की प्रक्रिया जारी रखें और उन्हें राशन से वंचित न करें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यों द्वारा दाखिल स्थिति रिपोर्टों में सेक्स वर्कर्स के आंकड़े वास्तविक नहीं हैं।

कोर्ट ने 29 सितंबर 2020 को राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वो नाको के जरिये सेक्स वर्कर्स को सूखा राशन उपलब्ध करवाएं। जस्टिस एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि राज्य सरकारें सेक्स वर्कर्स को राशन उपलब्ध कराते समय उनसे पहचान पत्र के लिए जोर नहीं देंगी। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या वो कोरोना के संकट के समय ट्रांसजेंडर्स को दी जानेवाली सहायता सेक्स वर्कर्स को भी दे सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि 2011 में कोर्ट ने कहा था कि सेक्स वर्कर्स को भी अन्य लोगों की तरह ही गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। उस समय देश भर के सेक्स वर्कर्स की हालत का अध्ययन करने के लिए कोर्ट ने एक कमेटी का गठन किया था।

यह याचिका दरबार महिला समन्वय कमेटी ने दायर की थी। याचिकाकर्ता की ओर से वकील आनंद ग्रोवर ने कोर्ट से कहा कि नाको के अध्ययन के मुताबिक देश भर में करीब आठ लाख 68 हजार से ज्यादा महिला सेक्स वर्कर्स हैं जबकि देश के 17 राज्यों में करीब 62 हजार 137 ट्रांसजेंडर हैं। ट्रांसजेंडर की संख्या के 62 फीसदी सेक्स वर्कर्स हैं।

याचिका में कहा गया है कि कोरोना संकट के दौरान मिलनेवाली सहायता बड़ी संख्या में सेक्स वर्कर्स को इसलिए नहीं मिल रही है कि उनके पास पहचान पत्र नहीं है। यह सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश का उल्लंघन है। याचिका में कोरोना संकट रहने तक सेक्स वर्कर्स को हर महीने सूखा राशन देने, उनके रोजाना के खर्चे के लिए पांच हजार रुपये का कैश ट्रांसफर करने और स्कूल जाने लायक बच्चे होने पर अतिरिक्त ढाई हजार रुपये हर महीने कैश ट्रांसफर करने की मांग की गई है।

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