
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता को लेकर गुजरात सरकार के फैसले का किया विरोध
नई दिल्ली- 01 नवंबर। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता को लेकर गुजरात सरकार के फैसले को संविधान विरोधी करार दिया है। बोर्ड का कहना है कि भारत जैसे देश में जहां विभिन्न धर्म एवं समुदाय के लोग रहते हैं वहां पर समान नागरिक संहिता लागू करने के बारे में सोचना संविधान एवं धार्मिक स्वतंत्रता का खुला उल्लंघन है।
बोर्ड के महासचिव मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने मंगलवार को कहा कि उत्तराखंड सरकार के बाद अब गुजरात सरकार ने समान नागरिक संहिता का फैसला किया है। यह न सिर्फ मुसलमानों बल्कि देश के तमाम अल्पसंख्यक समुदायों और आदिवासी समूहों के लिए अस्वीकार्य है। संविधान के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों में अपने-अपने मजहब के अनुसार अमल करने और धर्म प्रचार करने का अधिकार दिया गया है। इसके तहत विभिन्न ग्रुपों के पर्सनल लॉ को संरक्षण दिया गया है।
उनका कहना है कि हमारे देश और संविधान को बनाने वालों ने बहुत सोच समझकर और विभिन्न धर्मों एवं संस्कृतियों के ढांचे को सामने रखकर संविधान में इस अनुच्छेद को शामिल किया था। यह देश की एकता और संप्रभुता की पहचान है क्योंकि समाज में खानदानी कानूनों से विभिन्न ग्रुपों की पहचान होती है। अगर लोगों को उनकी पहचान से वंचित करने की कोशिश की गई तो यह बात लोगों को स्वीकार नहीं होगी।
मौलाना रहमानी ने कहा है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अन्य अल्पसंख्यकों के साथ मिलकर उत्तराखंड और गुजरात सरकार के फैसले के खिलाफ आवाज उठाएगा और इसका हर स्तर पर विरोध करेगा। उनका कहना है कि बोर्ड इस सम्बंध में क्रिस्चियन,सिख, बौद्ध और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के नेताओं के साथ संपर्क में हैं। उनका कहना है कि ऐसा लगता है कि सरकार चुनाव के अवसर पर अपनी नाकामी छुपाने के लिए इस तरह के मामलों को बढ़ावा दे रही है। हम सरकार से अपील करते हैं कि वह देश के वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय अपने फायदे के कामों में अपना समय बर्बाद ना करे और अल्पसंख्यकों को जो बुनियादी हक दिए गए हैं उसकी सुरक्षा करे।



