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सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसलों के लिए याद रहेगा वर्ष 2022

नई दिल्ली- 29 दिसंबर। वर्ष 2022 सुप्रीम कोर्ट के संदर्भ में कई वजहों से याद किया जाएगा। इस साल तीन चीफ जस्टिसों से रूबरू सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक रेप को मान्यता देने के साथ ही बिल्किस बानो, हिजाब पर विभाजित फैसला, ईडब्ल्यूएस आरक्षण, मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी को असीमित अधिकार, फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (एफसीआरए) संशोधन को मंजूरी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अपने फैसले दिए। आइए नजर डालते हैं सुप्रीम कोर्ट के दस बड़े फैसलों पर-

1- 29 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में वैवाहिक रेप को मान्यता दी। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट के तहत रेप में मैरिटल रेप भी शामिल है। कोर्ट ने कहा कि विवाहित महिला भी रेप का शिकार हो सकती है। वो अपने पति के साथ बिना इच्छा बनाए गए संबंध से भी प्रेग्नेंट हो सकती है। रेप को साबित करने की जरूरत एमटीपी एक्ट के लक्ष्य के खिलाफ होगा। पॉक्सो एक्ट और एमटीपी एक्ट को एक साथ देखना होगा।

2. 13 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो के दोषियों की रिहाई से जुड़े मामले में दायर बिलकिस की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने पुनर्विचार याचिका को ओपन कोर्ट में सुनवाई की मांग भी खारिज कर दिया था। बिल्किस बानो की पुनर्विचार याचिका में मांग की गई थी कि 13 मई के आदेश पर दोबारा विचार किया जाए। 13 मई के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गैंगरेप के दोषियों की रिहाई में 1992 में बने नियम लागू होंगे। इसी आधार पर 15 अगस्त को 11 दोषियों की रिहाई हुई।

गोधरा में 2002 ट्रेन जलाने की घटना के बाद हुई हिंसा के दौरान बिल्किस बानो का अपहरण कर लिया गया था और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या कर दी गई थी। उस वक्त वह 21 साल की थी और पांच महीने की गर्भवती थी। 21 जनवरी 2008 को मुंबई के स्पेशल कोर्ट ने 11 आरोपितों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने उनकी सजा को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1992 की छूट नीति के तहत राहत के उनके अनुरोध पर विचार करने के निर्देश के बाद दोषियों को गुजरात सरकार द्वारा रिहा कर दिया गया था।

3. 13 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हिजाब मामले पर विभाजित फैसला सुनाया है। जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक सरकार के हिजाब पर रोक के आदेश को सही करार दिया था जबकि जस्टिस सुधांशु धुलिया ने कर्नाटक सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया था। विभाजित फैसला होने की वजह से अब इस मामले को तीन जजों की बेंच को रेफर किया गया। अपने फैसले में जस्टिस हेमंत गुप्ता ने कहा कि धर्मनिरपेक्षता सभी नागरिकों पर लागू होती है, इसलिए एक धार्मिक समुदाय को अपने धार्मिक प्रतीकों को पहनने की अनुमति देना धर्मनिरपेक्षता के विपरीत होगा। सरकार की ओर से संचालित धर्मनिरपेक्ष स्कूल में धर्म का कोई मतलब नहीं है।

जस्टिस धूलिया ने जस्टिस हेमंत गुप्ता से अलग फैसला देते हुए कहा कि अगर छात्राएं क्लास रूम में हिजाब पहनती हैं तो उन्हें रोका नहीं जा सकता। हो सकता है कि हिजाब पहनने के चलते ही उसके रूढ़िवादी परिवार ने उसे स्कूल जाने की इजाज़त दी हो। जस्टिस धुलिया ने अपने फैसले में कहा कि एक लड़की के लिए अभी भी शिक्षा के लिए स्कूल तक पहुंचना आसान नहीं है। हिजाब पर रोक जैसे प्रतिबंध उन्हें शिक्षा से वंचित कर देगा। ऐसा करना स्पष्ट रूप से संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) और अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

4. सात नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान बेंच ने 3-2 के बहुमत से ईडब्ल्यूएस आरक्षण को वैध करार दिया था। जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण को वैध करार दिया था जबकि चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस एस रविंद्र भट्ट ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण से असहमति जताई थी। तीनों जजों ने कहा था कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण संविधान की मूल भावना का उल्लंघन नहीं करता है। इन जजों ने संविधान के 103वें संशोधन को वैध करार दिया है। बेंच के सदस्य जस्टिस पारदीवाला ने कहा था कि आरक्षण अनिश्चितकाल के लिए नहीं बरकरार रखा जा सकता है। जस्टिस बेला त्रिवेदी ने कहा था कि आरक्षण की नीति की दोबारा पड़ताल करने की जरूरत है। जस्टिस भट्ट ने बहुमत के फैसले से असहमति जताते हुए कहा था कि ईडब्ल्यूएस कोटे से एससी, एसटी और ओबीसी को बाहर करना ठीक नहीं है।

5. सुप्रीम कोर्ट ने 27 जुलाई को अपने फैसले में ईडी की शक्तियों और गिरफ्तारी के अधिकार को बहाल रखने का आदेश दिया था। जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली बेंच ने मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत ईडी को मिले विशेषधिकारों को बरकरार रखा था। कोर्ट ने पूछताछ के लिए गवाहों, आरोपितों को समन, संपत्ति जब्त करने, छापा डालने ,गिरफ्तार करने और ज़मानत की सख्त शर्तों को बरकरार रखा था। बता दें कि 25 अगस्त को इस फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। तत्कालीन चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली बेंच ने नोटिस जारी किया था। कोर्ट ने कहा था कि हम सिर्फ दो पहलुओं को दोबारा विचार करने लायक मानते हैं। ईसीआईआर (ईडी की तरफ से दर्ज एफआईआर) की रिपोर्ट आरोपित को न देने का प्रावधान और खुद को निर्दोष साबित करने का जिम्मा आरोपित पर होने का प्रावधान पर दोबारा सुनवाई करने की जरूरत है। पुनर्विचार याचिका कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने दायर की है जो अभी लंबित है। मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के प्रावधानों को चुनौती देते हुए दो सौ के आसपास याचिकाएं दायर की गई थीं जिस पर 27 जुलाई को कोर्ट ने फैसला सुनाया था।

6. सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को विदेशों से चंदा लेने के लिए एफसीआरए में केंद्र सरकार की ओर से किए गए बदलाव को सही ठहराया था। जस्टिस एएम खानविलकर की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि विदेश से चंदा पाना कोई ऐसा अधिकार नहीं है जिस पर रोक नहीं लगाई जा सकती है। कोर्ट ने कहा कि विदेशी चंदे का अनियंत्रित प्रवाह राष्ट्र की संप्रभुता, अखंडता और आम जनता के हितों के प्रतिकूल हो सकता है। संसद को इसका श्रेय दिया जाना चाहिए कि पुराने कानून में उन कमियों को दूर करने के लिए सही कदम उठाए, जिसे कोई भी संप्रभु देश बर्दाश्त नहीं कर सकता है। एफसीआरए में हुए बदलाव को सही ठहराते हुए कोर्ट ने गैर सरकारी संगठनों को भी नसीहत दी कि वे विदेशी चंदे की बजाय भारत में मौजूद दानकर्ताओं से अनुदान लेने पर ध्यान दें। दान देने वालों की भारत में कमी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि विदेशी चंदा कोई पूर्ण अधिकार नहीं है। सरकार नियम बनाकर इसे रेगुलेट कर सकती है।

7. सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को राजद्रोह के कानून पर केंद्र को कानून की समीक्षा की अनुमति देते हुए राजद्रोह के तहत फिलहाल नए केस दर्ज करने पर रोक लगा दिया था। तत्कालीन चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली बेंच ने ये आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी पर केस दर्ज हो तो निचली अदालत से राहत की मांग करे। कोर्ट ने लंबित मामलों में अभी कार्रवाई पर रोक लगाने का आदेश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि जेल में बंद लोग निचली अदालत में ज़मानत याचिका दाखिल करें। बता दें कि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा था कि उसने राजद्रोह के मामले में लगने वाली भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए की फिर से जांच करने और इस पर दोबारा विचार करने का फैसला किया है।

8. सुप्रीम कोर्ट ने 31 अक्टूबर को रेप केस की जांच के लिए किए जाने वाले टू फिंगर टेस्ट पर रोक लगा दिया। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि ये जांच पुरुषवादी सोच पर आधारित है कि यौन रूप से सक्रिय महिला का रेप नहीं हो सकता है। कोर्ट ने कहा था कि बार-बार कोर्ट की ओर से टू फिंगर टेस्ट की आलोचना करने के बावजूद अभी भी ये टेस्ट किया जा रहा है। इस टेस्ट का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इस टेस्ट से पीड़िता को दोबारा प्रताड़ित किया जाता है। इस पुरुषवादी सोच में कोई सच्चाई नहीं है कि यौन रूप से सक्रिय महिला का रेप नहीं हो सकता है। कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश दिया था कि वो ये सुनिश्चित करे कि रेप पीड़िता किसी भी महिला का टू फिंगर टेस्ट न किया जाए। इसके लिए जारी दिशानिर्देश को सभी सरकारी और निजी अस्पतालों में सर्कुलेट किया जाए। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि मेडिकल कॉलेजों में भी इसे लेकर बदलाव किया जाए और रेप के मामले की जांच के लिए टू फिंगर टेस्ट नहीं किया जाए।

9. सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर को राजीव गांधी हत्याकांड में दोषी करार दिए गए नलिनी, पी रविचंद्रन समेत बाकी लोगों की रिहाई का आदेश दिया। कोर्ट ने 30 साल से अधिक समय से जेल में बंद होने को आधार बताते हुए रिहा करने का आदेश दिया था। इससे पहले कोर्ट ने इस मामले के दोषी पेरारिवलन को भी इसी आधार पर रिहा किया था। सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार ने राजीव गांधी की हत्या के दोषी नलिनी और पी रविचंद्रन की रिहाई का समर्थन किया था। तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में ये बातें कही थीं।

10. सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार संविधान बेंच में होने वाली सुनवाई का सीधा प्रसारण शुरू किया। 27 सितंबर को पहली बार तीन संविधान बेंचों की सुनवाई का सीधा प्रसारण किया गया। पूर्व चीफ जस्टिस एनवी रमना के अंतिम कार्यदिवस के दिन 26 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का सीधा प्रसारण किया गया था। 26 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट की कार्रवाई की लाइव स्ट्रीमिंग को सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि भारत में कोर्ट सबके लिए खुला रखने की व्यवस्था है। अब लोगों को कोर्ट आने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।

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