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दवा की कीमतों में ‘इजाफा’ पर बोले स्वास्थ्य मंत्री, सरकार के प्रयासों से उपभोक्ताओं के बच रहे सालाना 3500 करोड़

नई दिल्ली- 03 अप्रैल। स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवश्यक दवा की कीमतों में इजाफा के आरोप पर आज कहा कि दवा कंपनियों को कीमत बढ़ाने के कानूनी अधिकार होने के बावजूद केन्द्र के प्रयासों से उपभोक्ताओं को अंदाज़न सालाना 3500 करोड़ रुपये की बचत होगी।

स्वास्थ्य मंत्री ने श्रृंखलाबद्ध ट्वीट में कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार में बनाये गए डीपीसीओ 2013 के प्रावधान अनुसार हर साल थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के हिसाब से फ़ार्मा कंपनियां दवा के दाम बढ़ाती या घटाती हैं। इसके बावजूद सरकार ने नवम्बर, 2022 में आवश्यक दवाओं की सूची व दामों पर दोबारा विचार किया था। इसके बाद राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण ने अधिसूचित दवाओं की मान्य अधिकतम कीमत संशोधित करने का कार्य शुरू किया था। अब तक 870 आवश्यक दवाओं में से 651 की नई अधिकतम कीमत अधिसूचित की जा चुकी है। इससे उच्चतम कीमतों में औसतन 16.62 प्रतिशत की कमी हुई है। इसी के चलते उपभोक्ताओं को अंदाज़न सालाना 3500 करोड़ रुपये की बचत होगी।

इसके साथ ही स्वास्थ्य मंत्री ने बाजार के प्रतिस्पर्धी माहौल का भी उल्लेख करते हुए कहा कि इससे भी दवा की कीमतें कम हुई हैं। उन्होंने कहा कि जनऔषधि अभियान सप्लाई पक्ष का बहुत बड़ा हस्तक्षेप है, जिसने मार्केट में एक उच्चतम प्रतिस्पर्धा तैयार की है। उन्होंने कहा कि सालाना (डब्ल्यूपीआई) के तहत जिस सीमा में दाम बढ़ाने की इजाजत है, उसके बावजूद फ़ार्मा कम्पनियाँ पूरा दाम नहीं बढ़ाती है।

स्वास्थ्य मंत्री ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण का एक ट्वीट भी साझा किया है। इसमें प्राधिकरण का कहना है कि बाजार में प्रतिस्पर्धा और सरकार की जनऔषधि परियोजना के कारण दवा कंपनियां कीमतों को अधिकतम मूल्य से काफी कम रखती हैं। उन्होंने इस बारे में पेरासिटामोल, एमोक्सीसाईक्लिन का उदाहरण दिया, जिनकी कीमतों में कमी आई है।

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