
दुनियाभर के विश्वविद्यालयों में होती पं. वाचस्पति मिश्र रचित दर्शनशास्त्र की पढ़ाई : पं. शंभूनाथ झा
मधुबनी- 15 मार्च। दर्शनशास्त्र की अद्भुत ग्रथों के रचयिता मधुबनी के पं. वाचस्पति मिश्र की डीह दुनिया के दर्शन शास्त्रियों के लिए एक तीर्थ से कम नहीं। इनका डीह दर्शनशास्त्र के युवा पीढ़ी को नई ऊर्जा प्रदान करता है। पुरातत्व महत्व वाले पं. वाचस्पति मिश्र डीह को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर दुनिया के सामने स्नातक धर्म, भारतीय दर्शन में एक नया आयाम स्थापित किया जा सकता है। पं. वाचस्पति मिश्र के रचनाओं का उल्लेख करते हुए विश्व प्रसिद्ध फेस रीडर व ज्योतिषाचार्य पं. शंभूनाथ झा ने कहा कि 13 मार्च 1994 को गोवर्द्धन मठ पुरी के जगतगुरू शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती पं. वाचस्पति मिश्र के डीह पर पहुंचे थे। पं. वाचस्पति मिश्र डीह के निकट प्राचीन टीला की खुदाई से मिथिला की प्राचीन इतिहास सामने आ सकता है। यहां के तालाब का जीर्णोद्धार कराया गया। पर्यटन विभाग द्वारा वर्ष 2012 में 35 लाख की लागत से पुस्तकालय का निर्माण कराया गया। पुस्तकालय के निकट उद्यान का निर्माण किया गया। पं. वाचस्पति मिश्र की मूर्ति स्थापित की गई।
कला संस्कृति एवं युवा विभाग वर्ष 2019 में 16-17 मार्च को पहली बार दो दिवसीय राजकीय वाचस्पति स्मृति समारोह का आयोजन किया गया था। पं. वाचस्पति मिश्र की डीह तक की यात्रा को आसान बनाने के लिए उनके डीह से करीब तीन किमी. की दूरी पर झंझारपुर-लौकहा रेलखंड पर साल 1972 में वाचस्पति नगर स्टेशन का शिलान्यास तत्कालीन रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र द्वारा किया गया था। स्टेशन के टिकट काउंटर स्थित पं. वाचस्पति मिश्र की तस्वीर लगाई गई थी। तस्वीर के निकट उनकी अंतिम रचना भामती के कुछ दोहे अंकित किए गए थे। पं. झा ने कहा कि झंझारपुर-लौकहा रेलखंड पर ट्रेनों का ठहराव झंझारपुर बाजार, महरैल, चंदेश्वरस्थान हाल्ट, वाचस्पतिनगर स्टेशन, बरहारा, हाल्ट, खुटौना स्टेशन, लौकहा स्टेशन पर होता है। पं. वाचस्पति मिश्र की सभी आठ रचनाएं (पांडुलिपि) संस्कृत में भोजपत्र पर लिखी गई थी। कई भाषा में रूपांतर उनकी रचनाएं दुनियाभर में उपलब्ध है। लेकिन उनकी सभी रचनाओं की (पांडुलिपि) मूल प्रति का पता नहीं चल रहा है। पं. वाचस्पति मिश्र की रचनाएं जर्मन सहित विश्व के अनेकों देशों की विश्वविद्यालयों में दर्शन विषय में पढ़ाई जाती है। उनकी रचनाएं इंडिया आफिस लाइब्रेरी लंदन, दरबार पुस्तकालय काठमांडू, संपूर्णानंद विश्वविद्यालय वाराणसी, गंगानाथ झा संस्कृत विद्यापीठ इलाहाबाद,भंडारकर इंस्टीट्यूट पुणे, डेक्कन कालेज पुणे, आर्यन लाइब्रेरी मद्रास, मिथिला इंस्टीट्यूट दरभंगा, राष्ट्रभाषा परिषद पटना, पटना विश्वविद्यालय पटना, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय सहित दुनिया के विश्वविद्यालयों व लाइब्रेरी की शोभा बढ़ा रहा है।
पं. झा ने कहा कि पं. वाचस्पति मिश्र जन्म 10वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में (920 से 976-77 के आसपास) मधुबनी जिले के अंधराठाढ़ी प्रखंड के ठाढ़ी गांव में हुआ था। उनका कर्मभूमि भी ठाढ़ी रहा। पं. वाचस्पति मिश्र जीवन रचना लेखन में गुजर गया। उन्होंने अपने जीवन काल में न्याय, मीमांसा, सांख्य, योग दर्शन पर आठ पांडुलिपि की रचना की।अंतिम रचना ‘भामती’ धर्म पत्नी को समर्पित कर दिए। पं. मिश्र 34 वर्षों तक ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अंतिम ग्रंथ की रचना की थी। रचना पूरा होने पर अपने समक्ष एक नारी को पाकर उन्हें अहसान हुआ कि रचना लिखने के दौरान 34 वर्षों तक जिसने उनका ख्याल रख वह उनकी पत्नी थी। पं. वाचस्पति मिश्र ने अपनी रचना को धर्म पत्नी भामती के नाम से नामांतरण कर दिया। भामती दुनिया को गृहस्थ जीवन में ब्रह्मसूत्र का ज्ञान प्रदान करता है। जगद्गुरु शंकराचार्य द्वारा ब्रह्मसूत्र व्याख्या शांकर भाष्यम पर टीका भामती की रचनाकर पं. वाचस्पति मिश्र ने शंकराचार्य के भाष्यम (व्याख्या) को सर्वाधिक प्रसिद्ध दिलाई।



